Tuesday, 22 May 2018

शिक्षा बचपन को निगल रही है।

प्रेमशंकर पुरोहित

आज की शिक्षा बचपन को निगल रही है। वर्तमान सन्दर्भ में यह पूर्णत: सत्य है। शिक्षा आजकल किताबों को रटकर पुरे-पुरे अंक लाने का पर्याय हो गयी है। इस दौड़ ने बच्चों के जीवन को किताबों के बोझ तले दबा कर उनके बचपन को दफन कर दिया है। रही सही कसार तथाकथित उच्च-स्तरीय कोचिंग सेंटरों ने कर दी है। बच्चे विद्यालय से आते ही कोचिंग के लिए चले जाते हैं और फिर देर शाम को घर वापिस आते हैं. ना तो उनके पास खेलने का समय रहता है और ना ही किसी मनोरंजन या शौक के लिए।  बच्चे पढाई के बोझ तले ऐसे दब गए है की उन्हें साँस लेने तक की फुरसत नहीं होती है । आये दिन क्लास टेस्ट, हर-हर महीने में परीक्षा और उसके ऊपर तरह-तरह की और परीक्षाएं जैसे ओलिंपियाड, और ज्याने क्या-क्या। फिर ये कम हो तो पाठशाला से प्रोजेक्ट भी आ जाते है  जिसमे बच्चें और माता-पिता को भी इसमें सहियोग करना पडता है खेल कूद की बात करें तो उसमे भी बच्चों को खुल के खेलने का मौका नहीं मिलता। सभी माता पिता को अपने बच्चे में सचिन तेंदुलकर, साइना नेहवाल, मेस्सी  माइकल जैक्सन , जैसे बड़े बड़े खिलाडी ही दिखते है, इसलिए स्कूल के बाद इन खेलों की कोचिंग के लिए बच्चे और घरवाले भागते दिखाई देते है । आज की शिक्षा प्रणाली गहरा दोष पूर्ण है। जिस तरह से छात्रों को उनके सीखने और जीवन के हर पहलू के बारे में सोचने और नियंत्रित करने के लिए शिक्षा प्रणाली का प्रयास अच्छे से अधिक नुकसान पहुंचा रहा है आज स्कूल शिक्षा के सही फोकस से दूर गिर रहे हैं ,आज के शिक्षा के एजेंडे का उप-उत्पाद छात्रों में स्वास्थ्य समस्या है।
 अत्यधिक दबाव, नींद की कमी, और काम के ढेर बच्चों में दरार करने के लिए पैदा कर रहे हैं कोई छात्र सफल नहीं हो सकता है यदि वह स्वस्थ नहीं है। स्वस्थ, परिवार और दोस्तों के लिए, और अतिरिक्त गतिविधियों की शिक्षा के अलावा मूल्यवान होना चाहिए, लेकिन स्कूल इन बातों के लिए छात्रों को समय नहीं दे रहे हैं।  पहले तीसरी क्लास तक बच्चों को सिर्फ एक बुक होती थी एवं लकडी की तख्ती पर खडी व कलम से लिखते थे उससे अक्षर व लिखाई बहुत ही सुन्दर होती थी। लेकिन अब तीन साल की उम्र पर किताबों का पुलिंदा लाद दिया जाता है। क्या बच्चे को  खोलने का अवसर दिया।  दिया एक कम्टीशन, जो पडोस के बच्चें से अच्छे नम्बर लान एवं आगे निकलना है।   हम अपने बच्चे को पड़ोसी के बच्चे से थोड़ा बेहतर बनाना चाहते हैं। एक तीन साल का बच्चा अगर कहता है,मैं डॉक्टर बनना चाहता हं ू , तो हर कोई अपने बच्चे से कहेगा,अरे, पड़ोसी का बच्चा डॉक्टर बनना चाहता है।  यह अपने आप में एक गंभीर समस्या है। तुम क्या बनना चाहते हो? यदि आप का बच्चे से  पूछा जाता है वह कहता है मुझे नहीं पता।  अरे कुछ तो बताओ यह शिक्षा व्यवस्था की बीमारी नहीं है, यह बीमारी समाज में पैठ गई है। हमारी शिक्षा व्यवस्था तो तो बस उसी हिसाब से चलने की कोशिश कर रही है।बचपन एक ऐसी उम्र होती है, जब हम तनाव से मुक्त होकर मस्ती से जीते हैं। नन्हें गुलाबी होंठों पर बिखरती फूलों सी हंसी, मुस्कुराहट। बच्चों की शरारत, रूठना, जिद करना, अड़ जाना ही बचपन है, लेकिन अपने दिल पर हाथ रखकर हमें बताना चाहिए कि क्या हमारे बच्चों को ऐसा वातावरण मिल रहा है? क्या यह सत्य नहीं कि उनका बचपन तनाव की काली छाया से कलुषित हो रहा है? क्या आप इस बात से इंकार कर सकते हैं कि हर सुबह स्कूल जाने से बचने के लिए वे पेट दर्द से लेकर सिरदर्द तक के अनेक बहाने नहीं बनाते हैं और क्या वे मुस्कुराते हुए भारी बस्ता टांगे खचाखच भरी स्कूल बस पर सवार होते हैं? क्या उनके नन्हे चेहरों पर उदासी व तनाव नहीं होता? स्कूल के बाद ट्यूशन, होमवर्क, ऐसे-ऐसे प्रोजेक्ट जो उन बच्चों से तो क्या उनके मां-बाप से भी न बनें और न जाने क्या-क्या? इस पर भी हम सामान्य बच्चों को अपेक्षाकृत अधिक चिड़चिड़ा, गुस्सैल प्रवृत्ति को उन्हें कोल्डड्रिंक, पिज्जा, बर्गर, पास्ता, चाउमिन खिलाकर शांत करने की भूल करते है,ं लेकिन भारी बस्ते के बोझ तले कराहते उसके बचपन की दूसरों से तुलना कर उसे हीन बताने का अपराध भी करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि केवल प्राथमिक कक्षाओं का ही नहीं बल्कि माध्यमिक स्तर के छात्रों का बस्ता काफी भारी है माध्यमिक कक्षाओं के बाद उच्च शिक्षा में प्रवेश की तैयारी के नाम पर देश भर में फैल रहे कोचिंग संस्थान लाखों की फीस लेकर बोझ को बस्ते में मन-मस्तिष्क तक पहुंचाने में अपना योगदान कर रहे हैं। वैसे यह समस्या केवल भारत की नहीं है, दुनियां के अनेक देशों ने बस्ते का बोझ कम करने में सफलता भी प्राप्त की है, लेकिन इसके तरीके निकाले गए हैं। वहां बच्चे की रुचि और प्रतिभा के अनुसार विषय में आगे बढ़ाया जाता है।
अनावश्यक बोझ का कोई प्रश्न ही नहीं होता। हमारे यहां बड़ी-बड़ी बातें तो हुई लेकिन समय के साथ शिक्षा में जो गुणात्मक सुधार होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। किताबी कीड़ा बनकर अथवा रट्टा लगाकर ज्ञान प्राप्त करने की गलत परम्परा के स्थान पर व्यावहारिक ज्ञान देकर बस्ते का बोझ कम किया जा सकता है। नयी शिक्षा नीति के प्रारूप में भी इसपर बहुत ध्यान नहीं दिया गया, अत: बहुत आशा करना व्यर्थ है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसा हो ही नहीं सकता।

Friday, 18 May 2018

लोगों के जंगलों में प्रवेश करने से बाघ, तेंदुए कर रहे मानव पर हमला

  जानवरों के हमले का मुख्य कारण सिकुडता जंगल फैसले गांव की आवादी, पानी -भोजन की तलाश के लिए अवैध कारणों के कारण जंगल खत्म की कतार में है भोजन की तलाश में वे गांवों की रुख करते आ रहे है। आश्चर्यजनक तरीके से, बाघ वनक्षेत्र या अपने जंगल के किनारों, खासकर गन्ने के खेत में जहां बाघ प्राय: रहने लगे हैं,  लोगों पर हमला करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अधिकतर हमले दिन में होते हैं, जिसमें बताया गया है सात से 70 वर्ष की आयु के लोगों पर हुए हमले दुर्घटनावश आमने-सामने आ जाने की वजह से होते हैं रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले में, वर्ष 2006 और 2012 के बीच 90.1 प्रतिशत मामले तेंदुए और बाघों के हैं। अन्य 9.9 प्रतिशत संघर्ष के मामले भालू, हाथी और मगरमच्छ द्वारा हुए हैं। हालांकि 50 प्रतिशत तेंदुए बच्चों और छोटे पशुओं जैसे भेड़, बकरी पर हमला करते हैं, जबकि बाघ बड़े जंतुओं जैसे भैंसों, घोड़ों और गायों पर हमला करते हैं। बाघों के मामलों में, अधिकतर लोग लकड़ी इकट्ठा करने जंगल जाते हैं और तभी संघर्ष होता है। ऐसे भी कई मामले हैं जहां बाघों ने मानवों के आवास में प्रवेश कर मानवों की हत्या की है, लेकिन यह काफी कम है रिपोर्ट के अनुसार, बाघों द्वारा 87 प्रतिशत हमले जंगलों, इसके आस-पास और गन्ने के खेतों में किए गए हैं, जबकि 13 प्रतिशत हमले गांवों और घरों के पास किए गए। बाघों की तुलना में तेंदुओं ने जंगलों और इसके आस-पास केवल 7.94 प्रतिशत हमले किए।  तेंदुओं ने इस दौरान 92.1 प्रतिशत हमले गांव या इसके आस-पास किए। इनमें से तेंदुओं ने 47.6 प्रतिशत हमले लोगों के घरों या घरों के आस-पास किए। तेंदुओं ने वहीं 15.87 प्रतिशत हमले गांव के अंदर किए, वहीं कृषि भूमि क्षेत्र में 28 प्रतिशत हमले किए। रिपोर्ट के अनुसार, 2000 से 2013 के बीच बाघों के हमले में कम से कम 49 लोग मारे गए और 24 घायल हुए। वहीं तेंदुओं के हमले में 14 लोग मारे गए और 49 घायल हुए।उत्तर प्रदेश को छोड़कर पूरे भारत में 2015-16 के दौरान 32 लोग मारे गए और 2016-17 में 13 लोगों की मौत हुई।

तेंदुओं ने अब निकटवर्ती ग्रामसभाओं के कुत्तों, गायों, बैलों, बकरियों को मारने के बाद अब मनुष्यों पर भी हमला शुरू कर दिया है। मगर इस संघर्ष को रोकने, जंगलों को बचाने की बात छोड़ वन विभाग मुआवजे की बात कर मूल समस्या से आँखें फेर रहा है।
पूरे देश में ऐसी घटनाएं रुकने की बजाए बढ़ती जा रही हैं, ऐसे में सवाल पूछा जाना चाहिए कि जानवर इसानों की बस्ती में घुस रहे हैं या इंसान जानवरों के क्षेत्र को कब्जा रहे हैं?वास्तव में मानवीय हस्तक्षेप और दोहन के कारण न सिर्फ वन क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं, बल्कि वन्य जीवों के शांत जीवन में मानवीय खलल में भी सीमा से अधिक वृद्धि हुई है। घास के मैदान कम होने से वे जीव भी कम हुए हैं, जो मांसाहारी जंगली जानवरों का भोजन होते हैं। जिसके बाद मानव और वन्यजीव संघर्ष की लखनऊ जैसी वीभत्स तस्वीरें सामने आती हैं। दुनियाभर में जंगली जानवरों के हमलों में हर साल सैकड़ों लोग अपनी जान गंवाते हैं तो बड़ी संख्या में लोग घायल भी होते हैं। मानव और वन्य जीवों का यह संघर्ष अब राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी चिंता का विषय बनता जा रहा है। भारत में सबसे ज्यादा खराब हालात उत्तराखंड, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में हैं। भारत में हाथी और बाघ जैसे जानवर औसतन हर रोज एक व्यक्ति को मार रहे हैं। लेकिन इसके उलट इंसान भी रोजाना औसतन एक तेंदुए को मार रहे हैं। पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक, अप्रैल-2014 से इस साल मई महीने के 1,143 दिनों में 1,144 लोग जंगली जानवरों के हमले में जान गंवा चुके हैं। यह ट्रेंड लगातार जारी है और इसके कम होने के आसार नहीं दिख रहे।आंकड़ों के मुताबिक, इसी अवधि में देशभर में 345 बाघ और 84 हाथी मारे गए। हालांकि इनमें से ज्यादातर जानवर शिकारियों के हाथों मारे गए। हाथियों को उनके दांतों के लिए निशाना बनाया गया। इंसानों की जो मौतें हुईं उनमें से 1,052 लोगों की मौत के लिए हाथी जिम्मेदार थे, जबकि 92 लोगों ने बाघ का शिकार बनकर जान गंवाई। इस अवधि में हाथियों और बाघों के हमले में सबसे ज्यादा इंसानों की मौत पश्चिम बंगाल में हुई। कुल मौतों में से एक तिहाई लोगों की जान अकेले इसी राज्य में गई। राज्य में हाथियों की कुल तादाद 800 के करीब है। दूसरे राज्यों में भी ऐसी काफी घटनाएं हो रही हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, साल-2015 में करीब 950 लोग जानवरों के हमले में मारे गए हालांकि इनमें घटनाओं की तादाद नहीं बताई गई है।देश का कोई भी कोना हो जीव-जंतुओं का पूरा आहार चक्र ही बाधित हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि घास प्रबन्ध अर्थात शाकाहारी जानवरों के लिए भोजन प्रबन्ध बिगड़ गया है। जब इनका भोजन अर्थात चारा जंगलों में नहीं होगा तो ये शहर-गांवों की तरफ क्यों नहीं आएंगे?
बाघ, तेंदुआ आदि जंगल छोड़कर आबादी की तरफ आने लगें तो इसे उनके संघर्ष की इंतहा ही कहना चाहिए। एक रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में करीब साढे तीन लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के सर्वे के आधार पर 14 हजार तेंदुए हैं। इनके स्वभाव में होता है कि ये घने जंगलों में रहने वाले बाघ से टक्कर नहीं लेता।पिछले 6 सालों में 257 लोगों की मौत जंगली जानवरों के हमलों की वजह से हुई है, जबकि 1,486 लोग जख्मी हुए हैं। सिर्फ उत्तराखंड में बात करें तो राज्य बनने से लेकर अब तक के 17 सालों में विभिन्न कारणों से 357 हाथी, 128 बाघ और 957 गुलदार मारे गए हैं।


Tuesday, 10 April 2018

कही गुम हो गया बचपन?

बचपन एक ऐसी उम्र होती है, जब बगैर किसी तनाव के मस्ती से जिंदगी का आनन्द लिया जाता है। नन्हे होंठों पर फूलों सी खिलती हँसी, वो मुस्कुराहट, वो शरारत, रूठना, मनाना, जिद पर अड़ जाना ये सब बचपन की पहचान होती है। सच कहें तो बचपन ही वह वक्त होता है, जब हम दुनियादारी के झमेलों से दूर अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि आज आपके बच्चों का वो बेखौफ बचपन कहीं खो गया है? आज मुस्कुराहट के बजाय इन नन्हे चेहरों पर उदासी व तनाव क्यों छाया रहता है?
अपनी छोटी सी उम्र में पापा और दादा के कंधों की सवारी करने वाले बच्चे आज कंधों पर भारी बस्ता टाँगे बच्चों से खचाखच भरी स्कूल बस की सवारी करते हैं। छोटी सी उम्र में ही इन नन्हो को प्रतिस्पर्धा की दौड़ में शामिल कर दिया जाता है और इसी प्रतिस्पर्धा के चलते उन्हें स्वयं को दूसरों से बेहतर साबित करना होता है। इसी बेहतरी व प्रतिस्पर्धा की
कश्मकश में बच्चों का बचपन कहीं खो सा जाता है। इस पर भी माँ-बाप उन्हें गिल्ली-डंडे, लट्टू, कैरम व बेट-बॉल की जगह वीडियोगेम थमा देते हैं, जो उनके स्वभाव को ओर अधिक उग्र बना देते हैं। अक्सर यह देखा जाता है कि दिनभर वीडियोगेम से चिपके रहने वाले बच्चों में सामान्य बच्चों की अपेक्षा चिड़चिड़ापन व गुस्सैल प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है। आजकल होने वाले रियलिटी शो भी बच्चों के कोमल मन में प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ा रहे हैं। नन्हे बच्चे जिन पर पहले से ही पढाई का तनाव रहता है। उसके बाद कॉम्पीटिशन में जीत का दबाव इन बच्चों को कम उम्र में ही बड़ा व गंभीर बना देता है। अब उन्हें अपने बचपन का हर साथी अपना प्रतिस्पर्धी नजर आता है, जिसका बुरा से बुरा करने को वे हरदम तैयार रहते हैं।
 ‍नौकरीपेशा माता-पिता के लिए अपने बच्चों को दिनभर व्यस्त रखना या किसी के भरोसे छोड़ना एक फायदे का सौदा होता है क्योंकि उनके पास तो अपने बच्चों के लिए खाली वक्त ही नहीं होता है इसलिए वे बच्चों के बचपन को छीनकर उन्हें स्कूल, ट्यूशन, डांस क्लासेस, वीडियोगेम आदि में व्यस्त रखते हैं, जिससे कि बच्चा घर के अंदर दुबककर अपना बचपन ही भूल जाए। बाहर की हवा, बाग-बगीचे, दोस्तों के साथ मौज-मस्ती यह सब क्या होता है, उन्हें नहीं पाता। पढ़ाई-लिखाई अपनी जगह है, परंतु बच्चों का बचपन भी दोबारा लौटकर नहीं आता है। कम से कम इस उम्र में तो आप उन्हें खुला दें और उन्हें बचपन का पूरा लुत्फ उठाने दें। । यही नहीं वे बच्चों और युवाओं के साथ निरन्तर सम्वाद कायम रखते हैं, ताकि उनके दृष्टिकोण और विचारों को समझा जा सके। आज यह सोचने की जरूरत है कि जिन बच्चों पर देश के भविष्य की नींव टिकी हुई है, उनकी नींव खुद ही कमजोर हो तो वे भला राष्ट्र का बोझ क्या उठायेंगे।
प्रत्येक भारतीय नागरिक स्वयं को अधूरा समझने लगता है। हम स्वयं को मॉडर्न समझने में गर्व अनुभव करते हैं।  इस दौड़ के कारण पारिवारिक, सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। पारिवारिक परंपराएं व संस्कार लुप्त होते जा रहे हैं। सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है तथा हमारी पुरातन भारतीय संस्कृति भी सिसकियां भर रही है। दौड़ में इन सभी को पावों तले रौंदा जा रहा है। इस अंधी दौड़ में हमारे बच्चों का बचपन बुरी तरह से कुचला जा रहा है। आज बच्चों को माता-पिता की गोदी नसीब नहीं है, क्योंकि समाज में अपने रुतबे तथा होड़ ने अजीविका के लिए माता-पिता को बच्चों से दूर किया है। उनका स्थान वेतनभोगी नौकरानी या आया ने ले लिया है।  नौकरानी या आया क्या कभी माता की ममता, प्यार दे पाएगी? दादा-दादी तथा परिवार के सदस्य पहले ही दूर कर दिए गए हैं, क्योंकि हमारा देश निरंतर एकल परिवार की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में बच्चों का लालन-पालन एक बंद कमरे में एक अजनबी महिला द्वारा किया जाता है, जहां न संस्कार हैं, न ही संस्कृति।  जैसे ही बच्चा अढ़ाई वर्ष का होता है, निजी विद्यालयों की उस बच्चे पर पड़ती है, तो तीन वर्ष या उससे पूर्व ही कामकाजी माता-पिता इन विद्यालयों के हवाले कर देते हैं। जो बच्चा अपने कल्पना लोक में आनंद के हिलोरों में खोया रहता है, उसे कान्वेंट स्कूल के नियमों की बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है। उसकी कोमल पीठ पर भारी बोझ वाला बस्ता लाद दिया जाता है। जितना बड़ा बस्ता, उतना ही नामी स्कूल। स्कूल में कभी अंग्रेजी तो कभी साइंस, गणित का बोझ।
 समझना मुश्किल है कि नन्हा सा कोमल बच्चा इसे कैसे उठाता होगा,   मेरे जीवन का एक व्यक्तिगत अनुभव इस वास्तविकता का एहसास करवा चुका है कि बिलखते बचपन को मोटी-मोटी किताबों की नहीं, बल्कि प्यार दुलार की आवश्यकता होती है। यही बच्चों के शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास का आधार भी है। अंतिम चरण तक बच्चों का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। उनका मानसिक विकास रुक जाता है। हमारे पास अपने बच्‍चों के लिए अब समय ही नहीं है,जब बचपन याद आता है तो हमजोलियों स्‍कूल और शरारतों का इतिहास मन के किसी कोने से निकल कर आंखों के सामने तैरने लगता है, बदलते दौर में क्‍या हमें अपना वही पुराना बचपन कहीं दिखता है।गली में न तो अब गुल्‍ली डंडा खेलते मासूमों की जमात है और न ही शरारतों से मोहल्‍ले को परेशान करने वाला अल्‍हडपन। रोजमर्रा की व्‍यस्‍त जिंदगी ने बच्‍चों के जीवन को बडे पैमाने पर प्रभावित किया है, कि क्‍या हमारे नौनिहाल भी इसी तरह अपने खानदान का नाम रोशन करेंगे। यह हम सोचते तो हैं पर इसके लिए अपने बच्‍चों को हम समय ही नहीं दे पाते। खोया वक्‍त कभी वापस नहीं आता और बचपन गुजर जाने के बाद उसे लौटाया नहीं जा सकता।

Monday, 2 April 2018

भारत का सबसे सस्ता भोजनालय-इंडियन पार्लियामेंट कैंटीन

सांसदों के भोजन पर 74 करोड़ की सब्सिडी!
भोपाल। देश में पेट्रोलियम पदार्थो को बाजार के हवाले किया जा चुका है, हर रोज दाम ऊंचे-नीचे हो रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गरीबों को रसोई गैस उपलब्ध कराने के लिए आमजन से गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी छोड़ने का आग्रह करते नजर आते हैं। मगर आपको यह जानकार हैरानी होगी कि हमारे माननीय सेवकों यानी संसद सदस्यों को संसद की कैंटीनों से सस्ता भोजन मुहैया कराने पर पांच वर्षो में 74 करोड़ रुपये की सब्सिडी देनी पड़ रही है।वैसे तो निर्वाचित प्रतिनिधि अपने को ह्यजनता का सेवक बताने से नहीं हिचकते, मगर एक बार चुनाव जीतने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में आने वाले बदलाव का किसी को अंदाजा नहीं है। एक तरफ जहां सांसदों को लगभग डेढ़ लाख रुपये मासिक पगार व भत्ते मिलते हैं, वहीं बिजली, पानी, आवास, चिकित्सा, रेल और हवाई जहाज में यात्रा सुविधा मुफ्त मिलती है। इतना ही नहीं, एक बार निर्वाचित होने पर जीवनर्पयत पेंशन का भी प्रावधान है। संसद के दोनों सदनों- लोकसभा और राज्यसभा में करोड़पति सांसदों की कमी नहीं है, उसके बावजूद उन्हें संसद परिसर में स्थित चार कैंटीनों में सस्ता खाना दिया जाता है। वास्तविक कीमत और रियायती दर पर दिए जाने वाले खाने के अंतर की भरपाई लोकसभा सचिवालय यानी सरकार को करनी होती है। औसत तौर पर हर वर्ष कैंटीन से सांसदों को उपलब्ध कराए जाने वाले सस्ते भोजन के एवज में 15 करोड़ की सब्सिडी के तौर पर भरपाई करनी होती है। मध्य प्रदेश के नीमच निवासी सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने सूचना के अधिकार के तहत सांसदों को रियायती दर पर मिलने वाले भोजन के चलते सदन या सरकार पर पड़ने वाले आर्थिक भार की जो जानकारी हासिल की, वह चौंकाने वाली है। बताया गया है कि बीते पांच सालों में सांसदों के सस्ते भोजन पर 73,85,62,474 रुपये बतौर सब्सिडी दी गई। गौड़ द्वारा मांगी गई जानकारी पर लोकसभा सचिवालय की सामान्य कार्य शाखा के उप-सचिव मनीष कुमार रेवारी ने जो ब्यौरा दिया है, उससे एक बात तो साफ होती है कि माननीय सेवकों ने हर वर्ष सिर्फ कैंटीन में किए गए भोजन से सरकार पर औसतन 15 करोड़ का भार बढ़ाया है।
 
सूचना के अधिकार के तहत दिए गए ब्यौरे के मुताबिक, वर्ष 2012-13 से वर्ष 2016-17 तक संसद कैटीनों को कुल 73,85,62,474 रुपये बतौर सब्सिडी दिए गए।
अगर बीते पांच वर्षो की स्थिति पर गौर करें तो पता चलता है कि वर्ष 2012-13 में सांसदों के सस्ते भोजन पर 12,52,01867 रुपये, वर्ष 2013-14 में 14,09,69082 रुपये सब्सिडी के तौर पर दिए गए। इसी तरह वर्ष 2014-15 में 15,85,46612 रुपये, वर्ष 2015-16 में 15,97,91259 रुपये और वर्ष 2016-17 में सांसदों को सस्ता भोजन मुहैया कराने पर 15,40,53,3654 रुपये की सब्सिडी दी गई। महंगाई के इस दौर सवाद चखना भी महंगा हो गया लेकिन पूरे देश में से एक ऐसी जगह है, जहां खाने वाली चीजें बहुत सस्ती मिलती हैं. यह जगह है,इंडियन पार्लियामेंट कैंटीन यहां खाने वाली चीजों की कीमतों कुछ इस तरह हैं. संसद के कैंटीन में फ्राइड फिश विद चिप्स की कीमत है 25 रुपए, चिकन करी- 29 रुपए, मटन करी 20 रुपए, दाल 1.50 रुपए, मछली 13 रुपए, रोटी और मसाला डोसा 6 रुपए में मिलता है. क्या इतने कम कीमत पर कहीं इतना लजीज खाना मिल सकता है. संसद भवन की कैंटीनों में सस्ता खाना इसलिए है क्योंकि खाने पर सब्सिडी दी जाती है और ये कीमत लोकसभा सचिवालय चुकाता है. संसद की ये वही कैंटीन है जहां खुद पीएम मोदी ने खाना खाने के बाद विजिटर्स बुक में लिखा था अन्नदाता सुखी भव. जी हां, भोजन की जिस थाली की कीमत सांसद 29 रुपए देते हैं, बाजार में उसकी कीमत 500 से 1000 रुपए तक होती है. जी हां यह भोजन किसी फाइव स्टार भोजन से कम नहीं होता है. वो तो संसद की सब्स‍िडी है, जो इसकी कीमत इतनी कम है. एक सांसद का वेतन 80 हजार रुपए होता है. साथ में कई प्रकार के भत्ते सरकार की ओर से दिये जाते हैं, लेकिन अगर भोजन की बात करें, तो उनके दाम देख आप भी शर्मा जायेंगे. खैर चलिये आपको संसद भवन की कैंटीन की रेट लिस्ट भी दिखा देते हैं : चाय 1 रुपए, सूप 5.50 रुपए, दाल 1.50 रुपए, मील्स 2.00 रुपए, सब्जी 8.00 रुपए, रोटी 1.00 रुपए, चिकन 24.50 रुपए, दोसा 4.00 रुपए, वेज बिरयानी 8.00 रुपए,  मछली 13.00 रुपए.केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, संसद की कैंटीन में खाने की कीमतें समय-समय पर लोगों के बीच चर्चा का विषय रही हैं. इसी बात को देखते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने संसद की खाद्य समिति को इस पर ध्यान देने के लिए कहा था. जिसके चलते अब ये समीक्षा की गई कि कैंटीन में खाने के दाम बढ़ने चाहिए.जानकारी के मुताबिक, समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने कई फैसले लिए जिनमें से यह फैसला सबसे महत्वपूर्ण रहा कि संसद की कैंटीन अब  गैर मुनाफा, गैर नुकसान के आधार पर काम करेगी. इसमें कहा गया है कि विभिन्न भोजन सामग्रियों की कीमतें बढ़ा दी गई हैं और इन्हें लागत की मूल कीमत पर बेचा जाएगा आरटीआई से मिली एक जानकारी के मुताबिक संसद में कैंटीन को पिछले पांच सालों में 60.7 करोड़ की सब्सिडी दी गई है. यह फैसला संसदीय खाद्य समिति की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है. अध्यक्ष ने इस समिति को कैंटीन को मिलने वाली सब्सिडी के मामले पर विचार करने के लिए गठित किया था.  नए नियम के अनुसार कीमतें कुछ इस तरह होंगी. जो वेज थाली 18 रुपये में मिलती थी वो अब 30 रुपये में मिलेगी. वहीं नॉन-वेज थाली 33 रुपये की बजाये 60 रुपये में मिलेगी. इसी तरह चिकन करी 29 रुपये की बजाये 61 रुपये में मिलेगी.  लोकसभा सचिवालय के अनुसार इन कीमतों की समय-समय पर समीक्षा की जाएगी. इसके अलावा कैंटीन में खाने के आइटम भी सीमित बनेंगे ताकि खाने की बबार्दी न हो. वहीं, टी/कॉफी वेडिंग मशीन लगाने की भी योजना है ताकि कर्मचारियों पर ज्यादा भार न आए. नई कीमतें सांसदों, लोकसभा और राज्यसभा से जुड़े स्टाफ, मीडियाकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों और बाहर से आने वाले लोगों पर लागू होंगी.
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Sunday, 25 March 2018

मुसीबत में है प्रवासी पक्षी


सर्दियों के दिनों में बिहार की झील, नदियां और ताल-तलैया प्रवासी मेहमानों से गुलजार हो जाते हैं। प्रवासी पक्षियों का कलरव पर्यटकों को लंबे अरसे से लुभाता रहा है लेकिन इन विदेशी मेहमानों के प्रति अब अतिथि देवो भव की परंपरा नहीं निभाई जाती। पक्षियों के आते ही शिकारियों का झुंड सक्रिय हो जाता है और मेहमानों को डाला जाने वाला दाना ही उनके लिए मौत का सबब बनता है। दूर देश से आई चिड़ियों में से कई अपने वतन नहीं लौट पाती हैं। राष्ट्रीय उच्च पथ के किनारे प्रवासी पक्षियों को बेचते बच्चे मेहमानों के प्रति शिकारियों के निर्मम व्यवहार की कहानी कहते हैं। वन विभाग पक्षियों के अवैध शिकार पर नियंत्रण का दावा करता रहा है लेकिन सच यह है कि क्रूर बर्ताव के कारण अब प्रवासी पक्षियों ने कुछ इलाकों में जाना ही बंद कर दिया है। पक्षी विशेषज्ञों की मानें तो जब पक्षियों के मूल निवास स्थान की झीलें और जलाशय बर्फ में तब्दील हो जाता है और भोजन की कमी होती है तब ये पक्षी अपेक्षाकृत गर्म इलाकों को अपना बसेरा बनाते हैं। 

बिहार में इन प्रवासी पक्षियों का सितंबर से ही आना शुरू हो जाता है और ये फरवरी तक इसी इलाके में टिके रहते हैं। सबसे पहले आते हैं खंजन (वामटेल्स) और अबाबील (स्वालीज)। नवंबर में बतख एवं चहा समूह के अन्य जल-पक्षी बड़ी संख्या में आते हैं। बिहार आने वाले प्रवासी पक्षी बाग-बगीचे और जंगलों में रहनेवाले होते हैं। इसमें रेड ब्रेस्टेड लाईकैचर, ब्लैक रेड स्टार्ट पक्षी शामिल है। कई तरह के बाज एवं अन्य शिकारी पक्षी तथा क्रेन एवं स्टोर्क जैसे बड़े-बड़े पक्षी भी प्रवास के लिए बिहार आते हैं। बिहार में छह पक्षी अभयारण्य हैं लेकिन उनकी देखरेख की व्यवस्था लचर है। फतुहा, बेगूसराय, कुशेश्वरस्थान, पटना सिटी जैसे स्थानों पर पक्षियों के व्यापार के बड़े केंद्र हैं। शिकारियों का समूह प्रवासी पक्षियों को इन केंद्रों पर पहुंचाता रहा है। वैसे हर इलाके में मांसाहार के लिए शरारती तत्व प्रवासी पक्षियों को शिकार बनाते हैं। काबर झील विदेशी पक्षियों का मनपसंद बसेरा बनती रही है। पहले लाखों की संख्या में रंग-बिरंगे पक्षी प्रवासी पक्षी यहां छह महीने तक अपना घर बसाते थे लेकिन अब स्थिति बदलती जा रही है। शिकारियों की कुदृष्टि इन पक्षियों पर पड़ी , इस वजह से पक्षियों का आना कम हो रहा है। पेशेवर शिकारी दाने में बेहोशी की दवा मिलाकर इन पक्षियों को पकड़ लेते हैं।

 कुछ पक्षियों का बकायदा शिकार होता है। पूरे देश में पक्षियों की 1200 से ज्यादा प्रजातियां और लगभग 2100 उपप्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें से 350 प्रजातियां प्रवासी हैं जो शीतकाल में यहां आती हैं। पाइड क्रेस्टेड कक्कू (चातक) जैसे प्रवासी पक्षी बरसात में यहां आते हैं। बिहार में पक्षियों की 300 से अधिक प्रजातियां हैं जिनमें से पचास फीसदी प्रवासी हैं। वनों की कटाई, तेजी से हो रहे शहरीकरण और जलाशयों को पाटे जाने से भी प्रवासी पक्षियों का आगमन घटा है।  इस वजह से मेहमानों ने अब दूसरी तरफ रुख करना शुरू कर दिया है। प्रवासी पक्षियों की पहचान के लिए इन्हें छल्ले पहनाने और ट्रांसमीटर की सहायता से इनके प्रवास की गतिविधियों को समझने की कोशिश हुई है लेकिन अध्ययन सीमित ही रहा है। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने कुछ प्रयास किए हैं लेकिन सरकारी प्रयास शून्य ही रहा है। प्रवासी पक्षी हिमालय के पार मध्य एवं उत्तरी एशिया एवं पूर्वी-उत्तरी यूरोप से बिहार आते हैं। लद्दाख, चीन, तिब्बत, जापान, रूस, साइबेरिया, अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान, मंगोलिया, पश्चिमी जर्मनी, हंगरी एवं भूटान से आकाश के रास्ते आने वाले इन पक्षियों पर खतरे बढ़ते ही रहे हैं। मां जानकी की प्राकट्य स्थली सीतामढ़ी में खास जगहों पर ही इन खूबसूरत पक्षियों का कलरव सर्दियों में सुनाई देता है। सुरसंड रानी पोखर, सिसौदिया मन के अलावा पंथापाकड़ पोखर के आस-पास हरियल चकवा, लालसर पक्षियों के समूह मछली का शिकार करने के लिए कुछ दिनों के लिए अपना डेरा जमाते हैं। लेकिन अब मेहमान पक्षी अपने जोड़े से बिछुड़ने के बाद ही स्वदेश पहुंच पाता है। पक्षियों के सौदागार इन्हें अपने जाल में फंसाकर हजारों की कमाई प्रति वर्ष जरूर कर लेता है।

वन्य एवं पर्यावरण मंत्रालय की अधिसूचना के द्वारा इसे वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत निषिध क्षेत्र घोषित किया। पिछले दो दशकों में कई आश्वासनों के बावजूद और इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल घोषित के बाद भी आधारभूत संरचना विकसित नहीं की गई। ठंड का मौसम आते ही यहां देश-विदेश से लालसिर वाले ग्रीन, पोर्टचाई स्पाटबिल, टीलकूट, बहूमणि हंस, लालसर, श्वंजन, चाहा, क्रेन, आइविस, डक, अंधिगा आदि पक्षी आते हैं जो तीन-चार माह रहते हैं। लेकिन इसमें चोरी छिपे अंधिगा, लालसर, चाहा का शिकार होता रहता है। कई जगहों पर चिड़ीमार का गिरोह सक्रिय है जो इन्हें मार-पकड़कर बेचते हैं। हालांकि एक-दो बार जिंदा पक्षी पकड़ने वाले के खिलाफ कार्रवाई हुई है। जनवरी में नए साल की शुरूआत पर जितनी तेजी से पक्षी आते हैं उतने ही तेजी से चंद पैसों के लिए ये पाहुन (विदेशी) पक्षी मार गिराए भी जाते हैं। जगह-जगह वन विभाग ने पक्षी शिकार नहीं करने के बोर्ड आदि लगाए है लेकिन जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत बनी हुई है।  पश्चिमी चंपारण जिला वाल्मीकि व्याघ्र आश्रयणी एवं जंगल व नदियों के प्रचुरता के मामले में जाना जाता है। चंपारण में कई ऐसी जगहें हैं जहां सर्दी के मौसम आरंभ होते ही प्रवासी पक्षियों का आना आरंभ हो जाता है। हां यह बात भी गौर करनेवाली है कि यहां के निवासी भी इन पक्षियों को मेहमान की तरह सम्मान देते हैं। हाल ही में वन विभाग के अधिकारियों ने नरकटियागंज के केहुनिया गांव में स्थित चिड़िअहवा तालाब पर आकर रह रहे प्रवासी पक्षियों के झुंड को देखकर खुशी जाहिर करते हुए ग्रामीणों को एक समिति भी गठित करने का सुझाव दिया।


Tuesday, 20 March 2018

सरकार की सरकारी सेवा में कमियों का ना पहुंचा पाना

 

भारत में तेजी से आर्थिक विकास होने के बावजूद देश में हर साल 4 लाख नवजात शिशुओं की 24 घंटे के भीतर मौत हो जाती है. मौत के प्रमुख कारणों में कुपोषण, निमोनिया और डायरिया जैसे रोग हैं, जिनका इलाज देश में सस्ता और आसान है। चैरिटी सेव द चिल्ड्रन नामक एन. जी. ओ. द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में यह पाया गया है कि विश्व में नवजात शिशुओं की मृत्यु में भारत का स्थान पांचवां है. यह संस्था वैश्विक अभियान के तहत दुनिया भर के सभी देशों में शिशुओं की मृत्यु दर में कमी लाने का प्रयास कर रही है. इस शोध में अगस्त और सितम्बर महीने में भारत सहित ब्रिटेन, इटली, चीन और केन्या जैसे देशों से 15,000 लोगों को शामिल किया गया था। भारत में सेव द चिल्ड्रन संस्था के प्रमुख थॉमस चंडी ने बताया कि भारत में सरकार की ओर से आम जनता को आधारभूत स्वास्थ्य सेवा दिए जाने की पहल के बावजूद देश में शिशु मृत्यु दर में कोई कमी नहीं हुई है. इस रिपोर्ट में 14 देश शामिल हैं. आंकड़ों के अनुसार हर साल लगभग 2 लाख शिशुओं की मौत जन्म के 24 घंटे के भीतर हो जाती है. यानि हर पन्द्रह सेकेंड पर एक शिशु की मौत हो जाती है. भारत में शिशु मृत्यु दर सबसे ज्यादा है यानि प्रति 1000 शिशुओं में 72 शिशुओं की मृत्यु हो जाती है, जो पड़ोसी देश बांग्लादेश से भी ज्यादा है. इतना ही नहीं हर साल देश में पांच साल की उम्र से पहले ही दो लाख बच्चों की मौत हो जाती है. हालांकि सरकार की ओर से स्वास्थ्य संबंधी कई योजनाएं हैं, जिसके लिए फंड है और संसाधन भी हैं. इसके बावजूद ज्यादातर जगहों पर स्वास्थ्य सेवाएं लोगों तक पहुंच नहीं पा रही हैं. दूर-दराज गांवों में जहां डॉक्टर ज्यादातर उपलब्ध नहीं होते लोग अपने बच्चों का इलाज अप्रशिक्षित और अनुभवहीन चिकित्सकों से करवाते हैं.चंडी के अनुसार नवजात शिशुओं की मृत्यु का सबसे प्रमुख कारण गरीबी है. इतना ही नहीं कई बार स्थानीय परम्पराएं और अंधविश्वास भी राह में रोड़े अटकाता है. कुछ आदिवासी समुदाय आज भी जन्म के बाद मां को शिशु स्तनपान कराने नहीं देते हैं.हालांकि टीकाकरण, घर की साफ-सफाई और स्तनपान जैसे विभिन्न प्रोग्रामों में चालीस अरब डॉलर निवेश करने से पहले की अपेक्षा मृत्यु दर में कमी हुई है. इस बारे में भारत की स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए इंटरव्यू में कहा, स्पष्ट है कि अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है. हमें इस दिशा में वर्त्तमान संसाधनों का उपयोग करते हुए खास राज्यों में फोकस करने की आवश्यकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 20 देशों में 44.5 लाख की आबादी वाला गोरखपुर शिशु मृत्यु दर के मामले में 18 वें नंबर पर है। इन आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि गोरखपुर ने पश्चिमी अफ्रीका के रिपब्लिक आॅफ गाम्बिया की जगह ले ली है। इस देश की आबादी 19.18 लाख है। वहीं गोरखपुर को टक्कर देने में 62.90 और 64.60 शिशु मृत्यु दर वाले जाम्बिया और साउथ सुडान हैं। उल्लेखनीय है कि गोरखपुर में विगत तीन दशकों से बड़ी संख्या में बच्चों की अकाल मौतें हो रही हैं। यहां शिशु मृत्यु दर सबसे ज्यादा है। आंकड़े इतने चौंकाने वाले हैं, अगर गोरखपुर एक देश होता तो वह उन 20 देशों की जमात में शामिल होता जहां सबसे ज्यादा मृत्यु दर हैं। अगर स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो गोरखपुर में पैदा हुए 1000 बच्चों में से 62 बच्चे एक साल से पहले ही मर जाते हैं। पूरे उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 48 का है जबकि पूरे भारत में 1,000 में से 40 बच्चों की मौत हो जाती है। सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के यूएस के डेटा से वैश्विक स्तर पर तुलना करें तो गोरखपुर दुनिया के ऐसे 20 देशों में शामिल दिखता है, जहां शिशु मृत्यु दर का आंकड़ा सबसे ज्यादा है।एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 20 देशों में 44.5 लाख की आबादी वाला गोरखपुर शिशु मृत्यु दर के मामले में 18वें नंबर पर है। राजस्थान में इन आठ सालों में 5.12 लाख, बिहार में 6.54 लाख, झारखंड में 1.70 लाख, महाराष्ट्र में 2.92 लाख, आन्ध्र प्रदेश में 3.35 लाख, गुजरात में 2.95 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु हुई. देश के चार राज्यों (उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश) में देश की कुल नवजात मौतों की संख्या में से 56 प्रतिशत मौतें दर्ज होती हैं.
 
वर्ष 2008 से 2015 की अवधि में भारत में 91 लाख बच्चे अपना पहला जन्म दिन नहीं मना पाए. इस अवधि में शिशु मृत्यु दर 53 से घटकर 37 पर आई है, पर फिर भी वर्ष 2015 के एक साल में ही
भारत के चार राज्यों, उत्तर प्रदेश (24.37 लाख), मध्य प्रदेश (8.94 लाख), राजस्थान (7.31 लाख) बिहार (10.3 लाख) में सबसे ज्यादा संकट की स्थिति है.
भारत के 56 प्रतिशत शिशु मृत्यु इन्हीं राज्यों में होती हैं. बहरहाल महाराष्ट्र (3.96 लाख), आंध्र प्रदेश (5.11 लाख), गुजरात (4.13 लाख) और पश्चिम बंगाल (3.68 लाख) की स्थिति भी बहुत दर्दनाक है. जब से वैश्विक स्तर पर सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों की चर्चा शुरू हुई है, तबसे भारत में बच्चों के लिए कुछ स्वास्थ्य योजनाएं जरूर बनने लगी हैं, किन्तु उनका दायरा ह्लजागरूकताह्व तक ही सीमित रहा है.भारत में वर्ष 2008 से 2015 की अवधि में पांच साल से कम उम्र के 1.13 करोड़ बच्चे दुनिया से कूच कर गए. हमने उनका स्वागत नहीं किया, हमने उन्हें संभाला नहीं और उनका जीवन मुरझा गया.
इनमें से 31.11 लाख बच्चों की मृत्यु उत्तर प्रदेश में, 11.59 लाख बच्चों की मृत्यु मध्य प्रदेश में, 8.9 लाख बच्चों की मृत्यु राजस्थान में, 13.40 लाख बच्चों की मृत्यु बिहार में हुई.
छोटे बच्चों की मृत्यु के बड़े कारण व्यवस्थित वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अध्ययनों से नवजात शिशु मृत्यु दर इतनी ज्यादा होने के चार महत्वपूर्ण कारण पता चले- समय से पहले जन्म लेने के कारण होने वाली जटिलताएं (43.7 प्रतिशत), विलंबित और जटिल प्रसव के कारण (19.2 प्रतिशत), निमोनिया, सेप्सिस और अतिसार यानी संक्रमण के कारण (20.8 प्रतिशत), जन्मजात असामान्यताओं के कारण (8.1 प्रतिशत).
  भारत के महापंजीयक की नमूना पंजीयन प्रणाली (एसआरएस) के मुताबिक भारत में शिशुओं की मौत का कारण समय पूर्व जन्म लेना और जन्म के समय बच्चों का वजन कम होना (35.9 प्रतिशत), निमोनिया (16.9 प्रतिशत), जन्म एस्फिक्सिया एवं जन्म आघात (9.9 प्रतिशत), अन्य गैर संचारी बीमारियां (7.9 प्रतिशत), डायरिया रोग (6.7 प्रतिशत), जन्मजाति विसंगतियां (4.6 प्रतिशत) और संक्रमण (4.2 प्रतिशत) हैं.

हाल ही में आई यूनिसेफ की रिपोर्ट चेताती है कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर के मामले में भारत की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। भले ही इस मामले में हम पाकिस्तान से बेहतर स्थिति में हों, लेकिन हमारी स्थिति बांग्लादेश, नेपाल और भूटान से भी बदतर है। भारत नवजात शिशुओं की मृत्यु दर के मामले में इथियोपिया, गिनी-बिसाऊ, इंडोनेशिया, नाइजीरिया और तंजानिया के समकक्ष खड़ा दिख रहा है। भारत में हर साल जन्म लेने वाले 2 करोड़ 60 लाखों बच्चों में से 40 हजार अपने जन्म के 28 दिनों के भीतर ही मौत के मुंह में समा जाते हैं। अर्थात यहां शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार पर 29 है। भारत में हर साल सात लाख नवजात शिशुओं की मौत हो जाती है। दुनिया में होने वाली नवजात शिशुओं की मौत में भारत की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत है। शिशु मृत्यु दर में दुनिया में भारत का स्थान पांचवां है। भारत में वर्ष 2008 से 2015 के बीच हर रोज औसतन 2137 नवजात शिशुओं की मृत्यु हुई। देश में अब भी शिशु मृत्यु की पंजीकृत संख्या और अनुमानित संख्या में बड़ा अंतर दिखाई देता है। भारत में शिशु मृत्यु दर देश के विकास के सभी मानकों को धराशायी कर रही है। बीते आठ सालों में देश में पांच साल की उम्र से पहले 1.3 करोड़ बच्चों की मौत हुई। चार राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश में कुल नवजात मौतों की 56 प्रतिशत मौतें दर्ज हुई। वर्ष 2008 से 2015 के बीच भारत में 1.13 करोड़ बच्चे अपना पांचवां जन्मदिन नहीं मना पाए। इनमें 62.4 लाख बच्चे जन्म के पहले महीने में ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। प्रश्न उठना लाजमी है कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर के मामले में भारत की स्थिति इतनी शोचनीय और चिंताजनक क्यों है? जब इसकी पड़ताल की गई तो यह तथ्य प्रकाश में आया कि महिलाओं की स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए आबंटित धनराशि का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। वर्ष 2014-15 से 2016-17 के बीच बच्चों और महिलाओं के लिए भारत सरकार द्वारा 31,890 करोड़ रुपए आबंटित किए गए। लेकिन इसमें से 7951 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं हो पाए। अगर राज्यों में इस व्यय पर नजर डालें तो इन तीन वर्ष की अवधि में बिहार को स्वास्थ्य बजट में 2947 करोड़ रुपए मिले, जिसमें से 838 करोड़ रुपए खर्च नहीं हो पाए। मध्यप्रदेश में 2677 करोड़ के स्वास्थ्य बजट में 445 करोड़, राजस्थान में 2079 करोड़ में से 552 करोड़, उत्तर प्रदेश में 4919 करोड़ में से 1643 करोड़ तथा महाराष्ट्र में 2119 करोड़ रुपए के बजटीय आबंटन में से 744 करोड़ रुपए खर्च नहीं हो पाए।भारत में नवजात मृत्यु, शिशु मृत्यु व मातृ मृत्यु की ऊंची दर हमेशा से चिंता का विषय रही है। इस स्थिति की प्रमुख वजह मूलभूत सुविधाओं की कमी के साथ ही सरकारी नीतियों की अदूरदर्शिता और प्रशासनिक लापरवाही भी है। दूरदराज के गांवों और आदिवासी अंचलों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र न होने के कारण आज भी प्रसूताओं को कई किलोमीटर की दूरी तय कर इन केंद्रों तक ले जाना पड़ता है, जहां प्रसव संबंधी न्यूनतम सुविधाएं और संसाधन प्राय: नदारद पाए जाते हैं। ऐसे में भात में, शिशु और मातृ मृत्यु की ऊंची दर बेहद चिंताजनक तो है, पर हैरानी का विषय नहीं है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हर रोज जितनी महिलाएं प्रसव के दौरान मरती है उससे कहीं ज्यादा गर्भ संबंधी बीमारियों की शिकार होती हैं जिसका असर लम्बे समय तक उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। आज भी भारत में औसतन सात हजार की आबादी पर एक ही डॉक्टर है। 2002 की स्वास्थ्य नीति की अनुशंसा के बावजूद हम आज तक स्वास्थ्य पर कुल जीडीपी के दो फीसद के बराबर राशि खर्च करने का प्रावधान लागू नहीं कर पाए। इसी का नतीजा है कि चिकित्सा क्षेत्र की तमाम प्रगति के बावजूद हम शिशु और मातृ मृत्यु दर को नियंत्रित करने के मामले में फिसड्डी ही साबित हुए हैं। भारत में नवजात शिशुओं की मौत का कारण कुपोषण, निमोनिया और डायरिया जैसी बीमारियां है। ‘सेव द चिल्ड्रन’ संस्था के प्रमुख थॉमस चांडी का मानना है कि भारत में सरकार की ओर से आम जनता को आधारभूत स्वास्थ्य सेवा दिए जाने की पहल के बावजूद शिशु मृत्यु दर में कोई खास कमी नहीं आई है। स्वास्थ्य सेवाएं सभी तक नहीं पहुंच पाना भी इसकी एक बड़ी वजह है। यदि लोगों को आसानी से मिलने वाले सहज इलाज का ज्ञान हो जाए तो इन शिशुओं की मृत्यु काफी हद तक रोकी जा सकती है। आज भी देश की आधी से ज्यादा महिलाओं का प्रसव किसी प्रशिक्षित धाई के बिना होता है। गरीबी और स्थानीय परम्पराएं तथा अंधविश्वास भी शिशु मृत्यु दर में वृद्धि का कारक बनते हैं। शिशुओं की मौत की त्रासदी की जड़ें लैंगिक भेदभाव और स्वास्थ्य व पोषण सेवाओं को खत्म किए जाने की नीति में भी दबी हुई हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में 26.8 प्रतिशत लड़कियों के विवाह अठारह साल से कम उम्र में हो जाते हैं, जिससे उन लड़कियों के कम उम्र में गर्भवती होने के कारण वे कमजोर, कुपोषित और असुरक्षित हो जाती हैं। केवल इक्कीस प्रतिशत महिलाओं को ही प्रसव-पूर्व सेवाएं- जैसे चार स्वास्थ्य जांचें, टिटनेस का इंजेक्शन और सौ दिन की आयरन फोलिक एसिड की खुराक आदि- मिल पाती हैं। विवाह अठारह साल से कम उम्र में होने से बच्चे कमजोर और कुपोषण का शिकार हो जाते हैं।
  ऐसे में सुरक्षित प्रसव और नवजात के जीवन की सुरक्षा आखिर की जाए तो कैसे! चूंकि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की प्रगति के लिए निवेश बहुत कम हो पाता है, इस तरह प्रकारांतर से प्रसूताओं को निजी सेवाओं की ओर धकेला जाता है। शहरी व ग्रामीण दृष्टि से भी भारत में नवजात शिशु मृत्यु दर में असमानता है। शहर में नवजात मृत्यु दर 15 है जबकि गांव में यह 29 है। 1 जनवरी 2017 से लागू मातृत्व लाभ योजना से भी असंगठित क्षेत्र की सत्तर प्रतिशत महिलाएं वंचित हैं। 35.9 प्रतिशत नवजात शिशुओं की मृत्यु का कारण उनका समय से पहले जन्म लेना, जन्म के समय वजन कम होना, मां का दूध नहीं मिलना और संक्रमण का शिकार होना है। भारत के महापंजीयक के मुताबिक संक्रमण के कारण 23.6 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु होती है जिनमें 16.9 प्रतिशत निमोनिया के कारण और 6.7 प्रतिशत डायरिया के कारण मौत के मुंह में समा जाते हैं। नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में वृद्धि की अन्य वजहों में कम उम्र में विवाह के साथ ही गर्भावस्था के दौरान समुचित भोजन की कमी और भेदभाव, मानसिक-शारीरिक अस्थिरता, विश्राम और जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं न मिलना, सुरक्षित प्रसव न होना आदि प्रमुख हैं। कुल मिलाकर शिशु मृत्यु दर में वृद्धि के तमाम कारणों में एक भी ऐसा नहीं है जिस पर नियंत्रण न पाया जा सके। जागरूकता, इच्छाशक्तिऔर कर्तव्यपरायणता के बल पर इस पर काबू पाया जा सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जबकि देश के नौनिहालों के जीवन से जुड़े इस विषय को संजीदगी से लिया जाए। क्या वजह है कि बात-बात पर संसद की कार्यवाही ठप करने वाले माननीयों की संवेदना इन मासूमों के सवाल पर जागृत नहीं होती! क्यों शिशु मृत्यु दर का मुद्दा चुनाव घोषणापत्र का विषय नहीं बन पाता!

भारत में गंभीर रूप से संकटग्रस्त10 पक्षियों की प्रजातियां


अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने 2013 के लिए भारत में देखी जाने वाली पक्षियों की दस प्रजातियों को गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल किया है। इनमें ग्रेट साइबेरियन क्रेन, गोडावण, सफेद पीठ वाला गिद्ध ,लाल सिर वाला गिद्ध, जंगली उल्लू स्पून बिल्ड सैंडपाइपर और सफेद पेट वाला बगुला आदि। इन पक्षियों की आबादी में गिरावट की मुख्य वजहों में आवास का नुकसान, संशोधन, विखंडन और समाप्त होना, पर्यावरण प्रदूषण, शिकार और भू-उपयोग में परिवर्तन शामिल है।

1. ग्रेट इंडियन बुसटर्ड (गोडावण)
ग्रेड इंडियन बुसटर्ड सबसे संकटग्रस्त प्रजातियों में से एक है जो सिर्फ भारत और इसके आस-पास के इलाकों में ही पाया जाता है। यह उड़ सकने वाली बड़ी पक्षियों की प्रजातियों में से एक है। इसका वजन 15 किलोग्राम होता है और यह जमीन से करीब 1 मीटर उंचा होता है। जमीन पर रहने वाले सबसे बड़े पक्षी का आवास झाड़ियां, लबे घास, अर्द्ध- शुष्क घास के मैदान और राजस्थान के अर्द्ध रेगिस्तान इलाके हैं। बहुत अधिक शिकार और आवास के समाप्त होने के कारण ये पक्षी भारत के कई इलाकों से समाप्त हो चुके हैं। यह राजस्थान का राज्य पक्षी है। महाराष्ट्र के सोलापुर में ग्रेड इंडियन बुसटर्ड सैंचुरी नाम से वन्यजीव अभयारण्य भी है।

2. लाल सिर वाला गिद्ध
लाल- सिर वाले गिद्ध को भारतीय काला गिद्ध या राजा गिद्ध भी कहते हैं। यह भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला पूर्वजगत गिद्धों की प्रजातियों में से एक है। पशु चिकित्सा में इस्तेमाल किए जाने वाले डाइक्लोफेनाक की वजह से हाल के वर्षों में इस प्रजाति की आबादी बहुत तेजी से कम हुई है। भारतीय गिद्ध, लंबी-चोंच वाला गिद्ध और सफेद पुट्ठे वाला गिद्ध, भारत में पाए जाने वाली गिद्ध की कुछ और प्रजातियां हैं और पक्षियों के विलुप्तप्राय प्रजातियों की श्रेणी में आती हैं।

3. जंगली उल्लू
परंपरागत उल्लू प्रजाति में से जंगली उल्लू - सबसे संकटग्रस्त प्रजात है और यह मध्य भारत के जंगलों में पाया जाता है। छोटे जंगली उल्लुओं को विलुप्त माना जाता था लेकिन बाद में इन्हें फिर से पाया गया और भारत में इनकी बहुत कम आबादी इन्हें विलुप्तप्राय की श्रेणी में ले आई। मेलघाट टाइगर रिजर्व, मध्यप्रदेश का तलोदा वन रेंज और वन क्षेत्र एवं छत्तीसगढ़ में छोटे जंगली उल्लू पाए जाते हैं। यह महाराष्ट्र का राज्य पक्षी है।

4. चम्मच की चोंच वाला टिटहरी
चम्मच की चोंच वाली टिटहरी विश्व की सबसे संकटग्रस्त पक्षी प्रजाति है और भारत में भी यह विलुप्तप्राय श्रेणी में ही आती है। बहुत ही कम आबादी, आवास का समाप्त होना और बहुत कम प्रजनन इस प्रजाति की पक्षियों को विलुप्त होने की कगार पर ले आया है। भारत में ये सुंदरवन डेल्टा और पड़ोसी देशों में पाई जाती हैं।

5. जेरडॉन्स करसर
रात में दिखाई देने वाला जेरडॉन्स करसर पक्षी भारत का सबसे संकटग्रस्त और रहस्य भरे पक्षियों में से एक है। यह खास तौर पर दक्षिणी आंध्र प्रदेश में देखी जाती है। जेरडॉन्स करसर विलुप्तप्राय पक्षी के तौर पर सूचीबद्ध है। इस विलुप्त घोषित किया जाना था लेकिन यह फिर से दिखी और आवास की कमी की वजह से विलुप्तप्राय प्रजाति बना हुआ है। यह पक्षी आमतौर पर गोदावरी नदी घाटी, श्री लंकामल्लेश्वर अभयारण्य और पूर्वी घाट के वन क्षेत्र में पाया जाता है।
6. चरस
चरस बुसटर्ड फैमली का दुर्लभ प्रजाति है और सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है। यह विलुप्तप्राय प्रजातियों में से एक है और दुनिया के अन्य स्थानों से लगभग समाप्त हो चुका है। भारतीय उपमहाद्वीप में 1,000 से भी कम युवा चरस मौजूद हैं। यह दुनिया का सबसे दुर्लभ बुसटर्ड है लेकिन शिकार और कृषि के भू-संरक्षण की वजह से इसका प्राकृतिक आवास समाप्त हो गया और यह दुर्लभ प्रजाति की सूची में आ गया।
7. सफेद पेट वाला बगुला
ग्रेट इड बेलिड हेरॉन जिसे इंपीरियल हेरॉन भी कहते हैं, पूर्वी हिमालय पर्वतमाला के ग्रेट हिमालय की तलहटी में पाया जाता है। लंबा, काला और भूरे रंग का बगुला बड़ी प्रजाति का है। इसकी गर्दन सबसे लंबी होती है और उस पर कोई काली धारी भी नहीं होती। दलदली जमीनों के समाप्त होने, शिकार और निवास स्थान का खत्म होना बगुलों के लिए प्रमुख चिंता का कारण है।

8. हिमालयी बटेर
अद्भुत और सुंदर हिमालयी बटेर तीतर के परिवार से है और उत्तराखंड के पश्चिमी हिमालय और भारत के उत्तरझ्र पश्चिम इलाके में ही पाया जाता है। हिमालयी बटेर भारतीय पक्षियों में से सबसे अधिक संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों में से एक है। आवास स्थान के समाप्त होने की वजह से ये विलुप्त होने की कगार पर आ गए हैं। बटेर मध्यम आकार वाले होते हैं और सिर्फ अपने आसझ्र पास के इलाकों में ही उड़ते हैं।
9. सोसिएबल लैपविंग
सोसिएबल लैपविंग कजाकिस्तान के घास के खुले मैदानों से आने वाला प्रवासी पक्षी है जो भारत के सिर्फ उत्तरझ्र पश्चिम इलाकों में ही पाया जाता है। मध्यम आकार का लैपविंग लंबी टांगों, गहरे रंग के पेट और छोटे काले बिल की वजह से बहुत आकर्षक दिखता है। आवास का समाप्त होना इस प्रजाति के पक्षियों को संकटग्रस्त सूची में लाने की मुख्य वजह है।
10. साइबेरियन क्रेन
शानदार साइबेरियन क्रेन प्रवासी पक्षी हैं और सर्दियों के मौसम में भारत आते हैं। खूबसूरत साइबेरियन क्रेन दुनिया में विलुप्तप्राय प्रजाति की पक्षियों में से एक हैं। बीते कुछ वर्षों में प्रवासी साइबेरियन क्रेन की आबादी थोड़ी कम हुई है और इन पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।

, पिछले सात सालों में 18 लाख उद्यम बंद हुए  एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले सात वर्षों ( 2015-16  से  2022-23 ) में भारत में लगभग 18 लाख उद्यम (M...