Thursday, 16 January 2020

मोबाइल ने छीना बचपन

मोबाइल  ने छीना बचपन

मोबाइल के चलन से बच्चों की मासूमियत खत्म होती जा रही है। बच्चे जिस तरह पहले छुट्टियों में परंपरागत खेलों से जुड़े रहते थे लेकिन अब वक्त बदल गया है। अब 90 फीसदी से ज्यादा बच्चे परंपरागत खेलों के बजाय इंटरनेट, आॅनलाइन या आॅफलाइन गेम्स पर समय बिताते हैं। पहले गली-मोहल्ले में खेल के मैदान पर थी, जहां सुबह-शाम बच्चों को खेलते हुए देखा जा सकता था। अब खेल मैदान भी खत्म हो गए हैं और  बचपन एक कमरे तक सिमट कर रह गया है। उनके खेल व मनोरंजन के तरीके बदल गए हैं। बच्चे पहले लुका-छिपी, गिल्ली- डंडा, रस्सी कूद, क्रिकेट, फुटबॉल, पतंग उड़ानें जैसे पारंपरिक खेलों से अपना मन बहलाते थे, वहीं अब बच्चे इन खेलों से दूर हो गए हैं। इससे उनका मानसिक विकास जरूर हो रहा है, लेकिन शारीरिक विकास ठीक ढंग से नहीं हो रहा है। शारीरिक व्यायाम, एकाग्रता, वाले इन सब खेलों की जगह अब पूरी तरह से मोबाइल गेम ने ले ली है। दरअसल आज के दौर में स्मार्टफोन ने जैसे जीवन में सब कुछ बदल कर रख दिया है। क्या बच्चे, क्या बड़े−बूढ़े धडल्ले से मोबाइल फोन का उपयोग कर रहे हैं। स्मार्टफोन, बच्चे इंटरनेट का उपयोग करने में सबसे आगे हैं। यह आंकड़ा वास्तव में चेताने वाला है कि खेलने−कूदने की उम्र के साढ़े छह करोड़ बच्चे इंटरनेट की दुनिया में डूबे रहते हैं। बड़े−बूढ़े, ज्ञानी−ध्यानी तक गूगल बाबा की सहायता लेने में कोई संकोच नहीं करते है। गूगल बाबा में पॉर्न वीडियो का भंडार रहता है  बच्चे उसको देखकर अपराध कर देते है,  इससे सीधे सीधे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ रहा है। सबसे चिंतनीय यह है कि इंटरनेट की लत के चलते बच्चों पर मनोवैज्ञानिक असर अधिक पड़ रहा है। भारत इंटरनेट 2019 की हालिया रिपोर्ट में उभर कर आया है कि देश में 45 करोड़ के लगभग इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चों के इंटरनेट के उपयोग के आंकड़ों को और जोड़ा जाए तो यह आंकड़ा और अधिक ही होगा। दरअसल स्मार्टफोन ने सबकुछ बदल कर रख दिया है। बच्चों के परंपरागत खेल छूटने की वजह आधुनिकता की अंधी दौड़ है। आजकल माता-पिता ही बच्चों को ऐसे खेल से दूर रखते हैं। वे भी उन्हें घरों से दूर नहीं जाने देते उन्हें डर रहता है कि कहीं बच्चा बाहर खेलेगा तो चोट लग जाएगी या बिगड़ जाएंगे। इसी सोच के कारण बच्चों को घरों से बाहर जाने से रोकते हैं। स्कूलों में जो प्रतियोगिताएं होती है उनमें भी भाग लेने के लिए बच्चों को अभिभावक प्रेरित नहीं करते हैं।मोबादल की लत से बच्चों को स्वाभाविक सामाजिक−मानसिक स्थिति पर विपरीत असर पड़ रहा है। बच्चों का जो स्वाभाविक विकास होना चाहिए वह नहीं हो रहा है और यह कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं कि इंटरनेट के अत्यधिक उपयोग के दुष्परिणाम सामने आते जा रहे हैं। दरअसल पूरा सामाजिक ताना−बाना बिगड़ता जा रहा है। बच्चों की मिलनशीलता और संवेदनशीलता खोती जा रही है। शारीरिक मानसिक विकास के परंपरागत गेम्स अब वीडियो गेम्स में बदलते जा रहे हैं। परंपरागत खेलों से होने वाला स्वाभाविक विकास अब वीडियो गेम्स के बदला लेने, मरने मारने वाले गेम्स लेते जा रहे हैं। यही कारण है कि बच्चे तेजी से आक्रामक होते जा रहे हैं। समूह में रहना या यों कहे कि दो लोगों के साथ रहने, आपसी मेलजोल को यह इंटरनेट खत्म करता जा रहा है। घर में ही बच्चे स्मार्टफोन पर गेम्स या यूट्यूब के वीडियो में इस तरह से खोए रहते हैं कि आपस में बात करने तक की फुर्सत नहीं दिखती। बच्चों में मोटापा बढ़ता जा रहा है। चिड़चिड़ापन आता जा रहा हैं,जहां तक कि बात-बात पर उत्तेजित हो जातक है झगडा करने लगते है एक कोना ही उनको अच्छा लगने लगता है न ही दोस्त, रिस्तेदार, नाना-नानी, दादा-दादी तक अच्छे नहीं लगते है  संस्कारों को भूल जाता है वह अपने में खोए रहने की आदत बनती जा रही है। इनका बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है. पिछले कई सालों में सूचना तकनीक ने जिस तरह से तरक्की की है, इसने मानव जीवन पर बेहद गहरा प्रभाव डाला है. न सिर्फ प्रभाव डाला है, बल्कि एक तरह से इसने जीवनशैली को ही बदल डाला है। शायद ही ऐसा कोई होगा, जो इस बदलाव से अछूता होगा। बच्चे और युवा तो सूचना तकनीक के प्रभाव से इस कदर प्रभावित हैं कि एक पल भी वे स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते।
महानगरों में  ही नहीं ग्रामीण इलाकों में यह मानसिक बीमारी इस कदर बढ़ चुकी है कि कई युवाओं को तो स्वास्थ्य सुधार केंद्र में भर्ती कराना पड़ रहा है. हालात ये हैं कि यदि इस पर काबू नहीं पाया गया, तो समाज में एक नई विकृति पैदा हो सकती है. इंटरनेट एडिक्शन डिस्आॅर्डर के लक्षण हर शहर के युवाओं में उभरने शुरू हो चुके हैं. इससे पहले कि युवा इस रोग की चपेट में पूरी तरह आ जाएं, ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी है. मोबाइल इंटरनेट ने सबसे बड़ा बदलाव मानव की जीवनशैली पर डाला है। रात को सोने के बजाय लोग मोबाइल की स्क्रीन पर नजरें टिकाए रहते हैं। दरअसल, लंबे समय तक ऐसा करने से नींद न आने की समस्या पैदा हो जाती है. जैसे-जैसे अंधेरा छाता है दिमाग में मेलेटॉनिन की मात्रा बढ़ती जाती है, जिससे हमें नींद आती है, लेकिन जब हम नींद को नजरअंदाज करते हुए मोबाइल पर नजरें टिकाए रहते हैं, तो धीरे-धीरे मेलेटॉनिन का बनना बंद हो जाता है, जिससे नींद न आने की बीमारी (इंसोम्निया) का खतरा पैदा हो जाता है. ऐसी हालत में लंबे वक्त तक दवाई के सहारे रहना पड़ सकता है। सबसे बेहतर यही है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखें। सप्ताह में एक दिन सिर्फ छुट्टी के दिन ही मोबाइल उनके हाथ में दें. बच्चा इंटरनेट पर क्या ब्राउज करता है, उसपर भी नजर रखें। बच्चों को तकनीक का सही इस्तेमाल करना सिखाएं।

प्रेम शंकर शर्मा

Tuesday, 5 November 2019

चुनाव के बाद जनता का दर्द !

चुनाव के बाद जनता का दर्द !
चुनाव  के करीब आते ही नेताओं के पास उनके चमचों की भीड़ इकठ्ठी होने लगती है शायद ,उनको नेता जी कोई काम दे दे। चुनाव का पर्चा भरते समय कई हजारों की भीड इकठ्ठी करना मामूली काम नही था पर अब दलालों ने यह काम आसान कर दिया । 500 -600 रुपये में पैदल और 800-1000 में मोटर साइकिल,2000 में कारों का काफिला मिल जाता। जितने आदमी चाहिए मिल जाते है। शान शौकत से शाही अंदाज से पर्चा भरने जाते है । चलों पर्चा भरकर आ गये चुनाव की तैयारी भी होने लगी, गली -गली में जिन्दावाद के नारे गूंजते मिल जायेगें। नेताजी हाथ जोड़कर आप के साथ हमदर्द बनकर खड़े रहने का बादा करते दिखाई देगें चाहे जीतने के बाद साढे चार साल तक दिखाई नही दे पर बड़े-बड़Þे आश्वासन एक दम कड़क होगा।  जैसे सगेभाई हो। उस समय आप के पैर छूकर माफी मांगते दिखाई दे रहे होगें कहेगे कि भूल चूक हो गई होतो माफ करना ,लेकिन वोट हमेंही देना। मै आप का महदर्द हूं आप के गांव-कस्वे में कितने काम करवाये  विकासों का पिटारों की लिस्ट गिनाएंगे।  इसमें साथ में चलने वाले लोग भी उनकी हां में हा मिलाते नजर आयागे। ढावों पर कार्यकर्ताओं को तन्दूरी दाल, चिकन कवाब, चिकन बिरयानी, तन्दूरी रोटीयों का भोजन होता दिखाई देगा। दूसरा उसकी बुराई करता दिखाई देगा। चलो शांत तौर से चुनाव हो गया । कही खुशी कहीं गम। किसी ने नेताजी के लिए झगडा भी कर लिया वाद में होगा तब देखा जायगा। फिर सोचा चलकर देखते है कि चुनाव के वाद जनता कितनी खुश है या दु:खी है।  एक कस्वे से गुजरा तो कनाते टेंन्ट फटे हुई जर-जर  हो कर रो रही थीं। लगा मानो कह रही है कि अब उनका महत्व कुछ नहीं रह गया है, इसलिए कि हारने वाला और जीतने वाला दोनों उसे छोड़ गए हैं । तो टेस्ट, स्टेज उजड़े-उजड़े उदासी मैं मुंह लटकार अपनी दुर्दशा की कथा आप कह रहे थे। जीपें- कारे एककम धूल सै ढंकी पंक्चर खड़ी थीं।चुनाव का बखेड़ा भरी बड़ा अजीब होता है। शुरू होते ही तमाम तरह के काम फैल जाते हैं और निपट जाएगे जीतने वाला खुश और हारने वाला दु:ख । 
सारे घोषणा पत्र और आश्वासन मटियामेट, रह जाता है तो सिर्फ चंद लोगों का रोने-पीटना। चुनाव बाद जो लोग सर्वाधिक रोते हैं,उनमें होते हैं- माइकवाला, गाड़ियां किराए पर देने वाला, ढाबे वाला, माला-फूल सप्शाईं करने वाला और तोरणद्बार सजाने वाला और नेताजी के पीछे जिन्दावाद -मुर्दावाद के नारे लगाने वाला जो 500-600 रुपये प्रतिदिन पर लाया गया था। पिछले दिनों जो चुनाव निपटे हैं, उनमें से एक चुनाव क्षेत्र का दौरा किया तो मैने हालात कुछ अजीव दिखाई दिये जो साफ कपडे पहनकर नेता ती को गाडी में घुमाते थे, माइक में बडी आवाज, बढ़िया खाना खिलाने वाले। जीपें-कारें एकदम छकड़ा होकर घूल से ढंकी पंचर हुई खड़ी थीं। जो जीप कल तक फर्राटे से दौड़ रही थी, उसकी गति को जैसे किसी ने कील लगा दिया। पेट्रोलपंप वाला अपना बिल लिए भटक रहा है तो जीतने वाला उसे परमिट रद्द करने की धमकी दे रहा है। मैंने एक मतदाता से पुन, ‘कहो लाला कैसी रही ?' वह अपना माथ पीटकर बोला, ‘क्या बताएं भाई साहब, जीतने के बाद नेताजी मिलते नहीं और मिलते हैं ते पहचानते नहीं, पहचानते हैं तो आश्वासनों का पुलिंदा थमा देते हैं।  मैंने पूछा। ‘तो फिर चुनाव से तुम्हें क्या फायदा हुआ ?' मतदाता बोला, 'सिर्फ तीन फायदे हुए-पहला मारा-मारी में टीशर्ट और जूते मिल गये, दूसरा, पांच-सात दिन तक नशे का इंतजाम  हो गया और तीसरा,चुनाव रहा तब तक अच्छा खाना मिला। तो फिर क्या बात है, तुम्हारे तो वोट की कीमत वसूल हो गई- अब तो शांत रहो। मैंने कहा। उत्तर में वह बोला, 'अजी भाई जी, बोट की भी कोई कीमत होती है वह तो अमूल्य है अमूल्य।'‘जिसका कोई मूल्य नहीं होता, वहचीज मुफ्त की होती है और मुफ्त की चीज का जो भी मिल जाए बड़ी बात है। तुम्हें वोट का मूल्य मिल चुका है।'  अजी यह तो कोई कार्यकर्ता हैं-इसलिए फिर से ये चीजें हाथ लग गई वरना मुफ्त दाता को ते उपहार में निसानियां मिली हैं। वह बोला। लगे हाथ मैं थोड़ी देर में उस ढाबे वाले के यहां जा धमका, जहां चंद रोज 'पहले छंगर लगा करता था। सिर पर हाथ लगाए रोने हीं वाला था कि मैंने पूछा, क्यों क्या बातहै ? ढाबे वाले ने कहा, ‘पांच हजार रुपए बाकी रह गए-हारने वाले पर और जीतने वाले पर। अब कहता है  मेरा तो दिवाला ही पिट गया।  दाल आटा  देने वाला चाहे ते मुझे रख ले अपने यहांं नौकर, पैसेतोे न दे पाऊंगा।  'ते अब क्या योजनाएं  हैं ?''योजना क्या है, बस दस-पंद्रह दिन मातम मनाएंगे बाद में धंधा-पानी में ध्यान देंगे। अभी ते मन ही नही ंलग रहा है। आटे-दाल वाला रोज पैसों के लिए चक्कर काटता है, उसे देने की जुगाड में है  अन्यथा  ढावा  बंद  करने की नैबत आ गई है। ढावे वाले ने सच उगला।  उसी समय जीप वाला आ गया । मैने उससे पूछा कहो भाई कैसा है धंधा पानी? बोला, ‘साला जीतने वाला नेतालाल भाड़ा नहीं दे रहा  बस आश्वासन देता.है। ज्वादा कहता हूं तो धमकी देता है परमिट खत्म करवा दूगा। मुझे ऐसा पता होता तो कभी नहीं देता अपनी गाड़ियां, सारी गाड़ियां काठ-कबाड़ हो गईं हैं। सुधारने के लिए पैसा नहीं है।पैसे के मामले में धोखा हुआ हैधोखा हुआ है साहब। गरीबी हटाने की बात करते थे पर बदले मेरी गरीबी बढ़ा गए।''अब क्या प्रोग्रामहै ? यह गांव छोड़कर शहर में जाकर कोई छोटा-मोटा घंघा करने की सोचत हूं। बाल-बच्चे  बच्चों को खाना खिलाने के लिए पैसे नही है। केवल बिचौलियों के दिन फिरे हैं, जिसने वोट दिलाने को ठेका लिया था। नया जीप ले आये है तथा मकान की नई मंजिल का काम करवा रहा है। चंद प्रचारक और कार्यकर्ता भी माला-माल हो गये हो गए हैं। जिनको दिन में एकवार खाने को नहीं था, वे मिठायां खा रहे है, हम लुटे हैं।' जीप वाला रो पड़ा। मुझे बड़ी पीड़ा हुईं। चुनाव से तो माहौल उल्टा बिगड़ गया है। सारी चिल्ल-पों खत्म हो गई है और माइक वाला दांत पीस रहा है। मैंने पूछा,'क्यों भाई, तुम और तुम्हारे शक्लपर बारह कैसे बजे है वह बोला, 'क्या बताएं भाई आधा  पैसा जीतेना वाला और आधा हारने वाला डकार गए। दोनों ने हाथ जोड़ लिए हैं। कहते हैं भाई सब्र रखो, पांच साल बाद फिर चुनाव होंगे, तब कर देगे सारा हिसाब। हम कहीं भागे थोड़े ही जा रहे हैं।'तुम्हारे साथ तो वाकई तुम्हारे साथ अन्याय हुआ! 'क्या बताएं, जनाब ! हर बार वही होता है और हम हैं कि समझते नहीं और लोभ में आकर लुट बैठते हैं। उससे सबक लेता तो, आज माइक की आवाज इस कदर नहीं फट गई होती। माइक वाला बोला मैंने पूछ, 'अब क्या कार्यक्रम है ? 'अब प्रोग्राम यह है कि मैं आपके पास डेढ़ हजार रुपए उधार लेने आने वाला था। आप आ गए हैं तो नेकीऔर पूछ-पूछ वाली बात हो गई है। 'लेकिन मैं तो खुद परेशान हैं भाषण लिखने और मेनिफेस्टो के लिए तीन हजार रुपए देने का वादा  किए थे,एक पैस नहीं दिया है नेताजी ने अब तक। इसलिए उधार के लिए तो तुम बैंक में एप्लाई करो। नेताजी की तिकड़म लगाकर दस- बीस हजार मार लो। मैंने पिंड छुड़ाया। वह बहक गया। उसकी आंखों में चमक लौट आई और एप्लीकेशन लिखने' लगा। चुनाव बाद के इन दर्द भरे अनुभवों से रू-ब-रू होकर मैं भी दंग था। 
प्रेमशंकर शर्मा( पुरोहित)
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Sunday, 17 February 2019

आतंकवाद पूरे विश्व के लिए नासूर है

आतंकवाद पूरे विश्व के लिए नासूर है

तंकवाद किसी एक व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र विशेष के लिए ही नहीं अपितु पूरी मानव सभ्यता के लिए कलंक है । हमारे देश मे ही नहीं बल्कि पूरे विश्व मे इसका जहर इतनी तीव्रता से फैल रहा है कि यदि इसे समय रहते नहीं रोका गया तो यह पूरी मानव सभ्यता के लिए खतरा बन सकता है। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएएफ के काफिले पर गुंरुवार की शाम में हुए आतंकी हमले में 44 जवान शहीद हो गए। पाकिस्‍तान में जड़ें जमा भारत में आतंक फौते रहे आतंकवादी संगठन 'जैश-ए-मोहम्मद' ने इस आत्‍मघाती हमले की जिम्‍मेदारी ली है। घटना के बाद पूरे देश में गम व गुस्‍से का माहौल है। सोशल मीडिया पर भी गम व गुस्से के इजहार का सिलसिला जारी है, शाब्दिक अर्थों में आतंकवाद का अर्थ भय अथवा डर के सिद्‌धांत को मानने से है । दूसरे शब्दों में, भययुक्त वातावरण को अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति हेतु तैयार करने का सिद्धांत आतंकवाद कहलाता है । विश्व के समस्त राष्ट्र प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसके दुष्प्रभाव से ग्रसित हैं । रावण के सिर की तरह एक स्थान पर इसे खत्म किया जाता है तो दूसरी ओर एक नए सिर की भाँति उभर आता है । यदि हम अपने देश का ही उदाहरण लें तो हम देखते हैं कि अथक प्रयासों के बाद हम पंजाब से आतंकवाद का समाप्त करने में सफल होते है तो यह जम्यू-कश्मीर, आसाम व अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रारंभ हो जाता है । पड़ोसी देश पाकिस्तान द्‌वारा भारत में आतकवाद को समर्थन देने की प्रथा तो निरंतर पचास वर्षो से चली आ रही है। हमारा देश धर्मनिरपेक्ष देश है । यहाँ अनेक धर्मो के मानने वाले लोग निवास करते हैं । हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, ब्रहम समाजी, आर्य समाजी, पारसी आदि सभी धर्मो के अनुयाइयों को यहाँ समान दृष्टि से देखा जाता है तथा सभी को समान अधिकार प्राप्त हैं । कुछ बड़ी शक्तियां और पड़ोसी देश हमारे देश में अव्यवस्था फैलाने की कोशिश में लगे रहते हैं। यदि हमारा देश दो भागों में विभक्त हो गया तो वे बहुत प्रसन्न होंगे। कुछ समस्याएँ जम्मू-कश्मीर की हैं जिन्हे शांतिपूर्ण तरीके से हल किया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्यवश हत्याएं जारी हैं। हमें आशा है की राजनीतिक शक्तियां इस समस्या का समाधान निकालेंगी।  आतंकवाद विश्वभर में फैला है, अभी कुछ दशकों में, उसने नए आयाम हासिल किए हैं और इसका कोई अंत नहीं है। जिस तरह से यह पिछले कुछ सालों से बढ़ रहा है, यह सीमाओं से परे है, हम सभी के लिए यह एक बड़ी चिंता का विषय है। हालांकि यह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेताओं द्वारा निंदित किया गया है, पर इसका कोई असर नहीं हुआ है, यह कई गुना बढ़ रहा है और इसके सबूत भी सभी जगह है।
 आतंकवादियों और उग्रवादियों ने अपने शत्रुओं को आतंकित करने के लिए सभी तरह के हथियारों और रणनीतियों का उपयोग किया है। वे बम विस्फोट करते हैं, राइफल्स, हथगोले, रॉकेट, लूटने वाले घरों, लूट के लिये बैंकों और कई धार्मिक स्थानों को नष्ट करते हैं, लोगों का अपहरण करते हैं, बसों और आगजनी और बलात्कार करते हैं, यहाँ तक कि बच्चों को भी नहीं छोड़ते हैं। देश में आतंकवाद के चलते पिछले पाँच दशकों में 50,000 से भी अधिक परिवार प्रभावित हो चुके हैं । कितनी ही महिलाओं का सुहाग उजड़ गया है । कितने ही माता-पिता बेऔलाद हो चुके हैं तथा कितने ही भाइयों से उनकी बहनें व कितनी ही बहनें अपने भाइयों से बिछुड़ चुकी हैं। पहले मसलन 1989 से 1998 की बात करें तो स्थिति चिंताजनक थी। तब मारे गए आम नागरिकों और आतंकियों की संख्या तकरीबन एक-सी रहती थी। दरअसल इन तीन दशकों में आतंकियों के खिलाफ सेना की मुहिम में और भी कई ट्रेंड नजर आ रहे हैं। पहले दो दशकों में सेना के ज्यादा जवान शहीद होते रहे। इस दशक में 4 से 6 गुना कमी आई। हालांकि ‘इस कमी’और ह्यपांच गुना आतंकी मारने का केंद्र की भाजपा सरकार से खास लेना-देना नहीं है।  यह ट्रेंड तो मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल के अंत (2008) से ही दिखाई देने लगा था। असल में इस दौरान सीमापार से घुसपैठ तथा घाटी में आतंकी वारदातों में ही कमी आ गई। यही वजह रही कि आम नागरिकों और जवानों की मौत का आंकड़ा 18 साल में पहली बार 100 से नीचे आ गया। साथ ही मारे गए आतंकियों की संख्या भी 17 साल बाद घटकर 400 से कम हो गई। वैसे अब एक बार फिर आतंकियों के खिलाफ अभियान में तेजी है। चार दिन में सात आतंकी मार दिए गए हैं। ऐसे में आतंकियों के मारे जाने की दर और बढ़ने की उम्मीद है। (तीन दशक, तीन ट्रेंड: लगातार घटे हमले और जनहानि)(1989से 1998: ज्यादा वारदातें हुईं और ज्यादा सैनिक शहीद) मारे गए नागरिक-8640,आतंकी मार गिराए-9403,शहीद हुए जवान-2326! (1999 से 2008: आतंकी वारदातों में डेढ़ गुना कम) मारे गए नागरिक-5842, आतंकी मार गिरा-12526,शहीद हुए जवान-3512! (2009 से 2018: 27गुना तक घट गईं आतंकी घटनाएं) मारे गए नागरिक-312,आतंकी मार गिराए-1518,शहीद हुए जवान-558 पहले मसलन 1989 से 1998 की बात करें तो स्थिति चिंताजनक थी। तब मारे गए आम नागरिकों और आतंकियों की संख्या तकरीबन एक-सी रहती थी। दरअसल इन तीन दशकों में आतंकियों के खिलाफ सेना की मुहिम में और भी कई ट्रेंड नजर आ रहे हैं। पहले दो दशकों में सेना के ज्यादा जवान शहीद होते रहे। इस दशक में 4 से 6 गुना कमी आई। असल में इस दौरान सीमापार से घुसपैठ तथा घाटी में आतंकी वारदातों में ही कमी आ गई। यही वजह रही कि आम नागरिकों और जवानों की मौत का आंकड़ा 18 साल में पहली बार 100 से नीचे आ गया। साथ ही मारे गए आतंकियों की संख्या भी 17 साल बाद घटकर 400 से कम हो गई। वैसे अब एक बार फिर आतंकियों के खिलाफ अभियान में तेजी है। चार दिन में सात आतंकी मार दिए गए हैं। ऐसे में आतंकियों के मारे जाने की दर और बढ़ने की उम्मीद है।(तीन दशक, तीन ट्रेंड: लगातार घटे हमले और जनहानि)(1989से 1998: ज्यादा वारदातें हुईं और ज्यादा सैनिक शहीद)मारे गए नागरिक-8640,आतंकी मार गिराए-9403,शहीद हुए जवान-2326!(1999 से 2008: आतंकी वारदातों में डेढ़ गुना कम)मारे गए नागरिक-5842,आतंकी मार गिरा-12526,शहीद हुए जवान-3512!(2009 से 2018: 27गुना तक घट गईं आतंकी घटनाएं)मारे गए नागरिक-312,आतंकी मार गिराए-1518,शहीद हुए जवान-558। मार्च 1998 से मई 2004 तक रहा। 1998 से 2003 तक की समयावधि में देखें तो मारे गए आम नागरिकों की संख्या 5082 रही। वहीं सुरक्षा बल के 2929 जवान शहीद हुए। मगर 10147 आतंकी मार दिए गए। 2004 से 2013 तक देखें तो 1788 आम लोग, 1177 जवान तथा 4241 आतंकी मारे गए हैं। हालांकि इनके पहले कार्यकाल में 3424 आतंकी सेना ने मार गिराए। मोदी के 4.5 साल: 701 आतंकी मारे भाजपा के पूर्णबहुमत के साथ नरेंद्र मोदी मई 2014 से प्रधानमंत्री है। इस बीच 17 जून 2018 तक 161 आम नागरिक आतंकी घटनाओं का शिकार बने। सुरक्षा बल के 303 जवान भी शहीद हो गए। मगर सेना ने 701 आतंकियों को मार गिराने में सफलता हासिल की । मार्च 1998 से मई 2004 तक रहा। 1998 से 2003 तक की समयावधि में देखें तो मारे गए आम नागरिकों की संख्या 5082 रही। वहीं सुरक्षा बल के 2929 जवान शहीद हुए। मगर 10147 आतंकी मार दिए गए। 2004 से 2013 तक देखें तो 1788 आम लोग, 1177 जवान तथा 4241 आतंकी मारे गए हैं। हालांकि इनके पहले कार्यकाल में 3424 आतंकी सेना ने मार गिराए। मोदी के 4.5 साल: 701 आतंकी मारे भाजपा के पूर्णबहुमत के साथ नरेंद्र मोदी मई 2014 से प्रधानमंत्री है। इस बीच 17 जून 2018 तक 161 आम नागरिक आतंकी घटनाओं का शिकार बने।
सुरक्षा बल के 303 जवान भी शहीद हो गए। मगर सेना ने 701 आतंकियों को मार गिराने में सफलता हासिल की । वे बहुत शक्तिशाली राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय निहित हितों द्वारा प्रशिक्षित, प्रेरित और वित्तपोषित हैं, वे इन शक्तियों से घातक हथियार और गोला-बारूद प्राप्त करते हैं और लोगों में कहर पैदा करते हैं। इस बदसूरत और खतरनाक, सामाजिक और राजनैतिक घटना को आतंकवाद कहा जाता है, आतंकवाद की कोई, समय, सीमा, जाति और धर्म या पंथ नहीं है। यह दुनिया भर में फैला है और समाज में और राजनीतिक समूहों के रूप में निराशा पैदा करता है, यह धार्मिक कट्टरपंथियों और गुमराह गुटों में अधिक से अधिक लोकप्रिय हो रहा है। जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद एक आम बात है। व्यापक गरीबी, बेरोजगारी, युवाओं, किसानों और मजदूर वर्ग की उपेक्षा और भावनात्मक अलगाव प्रांत में उग्रवाद के मुख्य कारण हैं। हमारी सीमाओं में शत्रुतापूर्ण बल भी बहुत मदद
कर रहे हैं। भारत की सहायता के साथ बांग्लादेश के एक स्वतंत्र राज्य बन गया जो कि पाकिस्तान को बर्दाश्त नहीं हुआ।आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है और इसे अलगाव में हल नहीं किया जा सकता है। इस वैश्विक खतरे से लड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहकारी प्रयासों की आवश्यकता है और दुनिया के सभी सरकारों को एक साथ और लगातार आतंकवादियों पर हमले करना चाहिए। विभिन्न देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग से वैश्विक खतरे को कम किया जा सकता है। मानवता के खिलाफ एक अपराध है और इसे पूरी कोशिश से निपटा जाना चाहिए और उसके पीछे की ताकतों को उजागर करना चाहिए। आतंकवाद, प्रतिकूल जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है और हमारे साथ कठोर व्यवहार करता है। अंतिम विश्लेषण में, सभी आतंकवादी समूह आपराधिक हैं वे अच्छे और बुरे के बीच अंतर नहीं जानते और न ही वे किसी को भी छोड़ते हैं, महिलाओं और बच्चों को भी नहीं।

                   -प्रेम शंकर शर्मा पुरोहित


Saturday, 9 February 2019

स्वाइन फ्लू की गिरफ्त में पूरी दुनिया

स्वाइन फ्लू की गिरफ्त में पूरी दुनिया

एक तूफान की तरह आई ‘स्वाइन फ्लू’ बीमारी ने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। लाखों लोग इससे प्रभावित हुए हैं। अभी तक यह बीमारी थमने का नाम नहीं ले रही है। इसके पीछे एच-1 एन-1 वायरस का हाथ है जिसने लाखों जिंदगयां छिन ली हैं। इंसान और वायरस के बीच पूरी दुनिया में चल रही खतरनाक लड़ाइयों की श्रृंखला में यह ताजातरीन बीमारी है। इसके अलावा हजारों ऐसे वायरस हैं जो इंसानों के जान के  दुश्मन बने हुए हैं। वैज्ञानिक इन सभी वायरसों से मुक्ति पाने के लिए प्रयासरत हैं, कि लेकिन सफलता इतनी आसान भी नहीं है। देश में स्वाइन फ्लू के बढ़ते प्रकोप के बीच केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूदन ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हालात की समीक्षा की। इस दौरान सचिव को बताया गया कि साल 2019 में 4 फरवरी तक देश में स्वाइन फ्लू के कुल 6701 मामले सामने आए हैं।
 वहीं, स्वाइन फ्लू के चलते अब तक 226 सिर्फ दिल्ली में लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें से ज्यादातर मौतें राजस्थान, गुजरात और पंजाब में हुई है। राजधानी दिल्ली में स्वाइन फ्लू के मरीजों की संख्या 1019 हो गई है। बढ़ते मामलों को देखते हुए दिल्ली सरकार ने एक बार फिर गाइडलाइन जारी की है। इसके पहले बीते शुक्रवार को सरकार ने दिशा निर्देश जारी किए थे। बीते 48 घंटे के दौरान राजधानी में 124 मामले दर्ज किए गए हैं। इसके साथ ही इस जनवरी से अब तक सिर्फ दिल्ली में ही स्वाइन फ्लू पीड़ितों की संख्या 1019 हो गई है। इसमें 812 वयस्क और 207 बच्चे शामिल हैं। दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग की गाइडलाइन के अनुसार खांसने और छींकने के दौरान अपनी नाक व मुंह को कपड़ा या रुमाल रखें। अपने हाथों को साबुन व पानी से नियमित धोयें, भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में जाने से बचें, फ्लू से संक्रमित हों तो घर पर ही आराम करें, फ्लू से संक्रमित व्यक्ति से एक हाथ तक की दूरी बनाए रखें, पर्याप्त नींद और आराम लें, पर्याप्त मात्रा में पानी - तरल पदार्थ पियें और पोषक आहार खाएं। इसके अलावा अपनी सुरक्षा को लेकर विशेष ध्यान रखें। यदि शरीर में दर्द या अन्य किसी तरह की परेशानी लगे तो डाक्टर से जरूर मिले। दिल्ली में स्वाइन फ्लू तेजी से फैल रहा है। अब तकसैकडों अधिक मरीज दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों में पहुंच चुके हैं। जबकि रोजाना 100 के करीब मरीज स्वाइन फ्लू के लक्षणों के साथ पहुंच रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों पर गौर करें तो 2016 में कुल 265 मौतें हुईं, इस बार उससे करीब चार गुना (1094) मौतें हो चुकी हैं। प्रभावितों की संख्या तो 12 गुना बढ़कर 2कई हजार से ज्यादा हो गई है।  स्वास्थ्य मंत्रालय ने बीमारी के उपचार, प्रबंधन, टीकाकरण, पृथक व्यवस्था, जोखिम के वर्गीकरण और रोकथाम उपायों के बारे में दिशानिर्देश हर अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों को जारी किए। सभी अस्पतालों को वेंटिलेटर तैयार रखने और रोग से रोकथाम के लिये सूचना प्रसारित कर रहा है।  (एच1एन1) पर राज्य स्तरीय समीक्षा बैठक के बाद दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सचिव संजीव खिरवाल ने हाल में कहा था कि शहर में सभी सरकारी अस्पतालों में इस बीमारी के प्रबंधन के लिये आवश्यक साजो-सामान एवं निजी सुरक्षा उपकरण (पीपीई किट) सहित दवाइयां उपलब्ध हैं।
 साथ ही एन-95 मास्क भी मौजूद हैं। लेकिन स्थिति इन अस्पतालों की संतोषजनक नहीं है। मरीजों के लिए स्वाइन फ्लू वार्ड में जगह नहीं है, उन्हें मास्क बाजार से खरीदना पड़ रहा है। स्वाइन फ्लू, डेंगू, डायरिया जैसी बीमारियों से हजारों मौतें हो रही हैं, बाढ़ से देश भर में सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं, लेकिन इन मौतों पर देश भर में हैरत भरी चुप्पी है. देश भर में इस साल के आठ महीनों में अब तक सिर्फ स्वाइन फ्लू से हजारों से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं.केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार देश में इस साल अब तक लोग स्वाइन फ्लू से मारे गए हैं जो पिछले साल के आंकड़े से चार गुना ज्यादा है.साथ ही अब तक इस बीमारी के कुल 22,186 मामले सामने आए हैं. महाराष्ट्र में एच1एन1 संक्रमण से सबसे ज्यादा लोग मारे गए हैं. यह संख्या 437 है. इसके बाद गुजरात में सर्वाधिक 269, केरल में 73 और राजस्थान में 69 लोगों ने बीमारी के कारण दम तोड़ा है.आंकड़े के अनुसार भारत में  बीमारी से कुल 1,094 मौतें हुई हैं और 22,186 मामले सामने आए हैं. यह  सरकारी आंकडे है लेकिन सत्यता यह है कि मरने वालों की संख्या कई गुना ज्यादा हो सकता है। जबकि 2016 में यह संख्या क्रमश: 265 और 1,786 थी। महाराष्ट्र में  एच1एन1 संक्रमण के सबसे ज्यादा 4,245 मामले सामने आए और इसके बाद गुजरात में 3,029, तमिलनाडु में 2,994 और कर्नाटक में 2,956 मामले सामने आए.आंकड़े के अनुसार केवल अगस्त महीने में देश भर में 342 लोग मारे गए, जबकि पिछले साल इसी अवधि में छह लोग मारे गए थे.देश में 2009-10 में एच1एन1 इंफ्लूएंजा का सबसे बुरा प्रकोप आया था जब बीमारी से 2,700 से ज्यादा लोग मारे गए थे और करीब 50,000 अन्य प्रभावित हुए थे. फरवरी तक के आंकडे बता रहे है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने भी स्वाइन फ्लू के मद्देनजर लोगों के लिए परामर्श जारी किया है. कई राज्यों में स्कूलों और कॉलेजों में छात्र-छात्राओं और स्टाफ को स्वाइन फ्लू से बचने के उपाय बताए जा रहे हैं. इसके लिए बाकायदा गाइड लाइन जारी की गई हैं. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के चीफ मेडिकल आॅफिसर (सीएमओ) ने भी स्वाइन फ्लू को लेकर स्कूलों और कॉलेजों को एडवाइजरी जारी की है, जिसमें उन्होंने कहा कि सभी स्कूल और कॉलेज विद्यार्थियों को स्वाइन फ्लू से अलर्ट करें और उनको इस बचने के तरीके बताएं. अभी हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह भी स्वाइन फ्लू की चपेट में आ गए थे. इसके बाद उनको दिल्ली के आॅल इंडिया इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया गया था. बीजेपी अध्यक्ष ने खुद ट्वीट कर इसकी जानकारी दी थी. उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा था, मुझे स्वाइन फ्लू हुआ है, जिसका उपचार चल रहा है. ईश्वर की कृपा, आप सभी के प्रेम और शुभकामनाओं से शीघ्र ही स्वस्थ हो जाऊंगा. देश में स्वाइन फ़्लू के कारण मरने वालों की संख्या इस साल 169 हो गई है, जबकि 4,571 लोगों में स्‍वाइन फ्लू वायरस होने के संकेत मिले हैं, जिसमें राजस्थान में 40 प्रतिशत मामले हैं। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में  1,911 मामले और 75 मौतें दर्ज की गईं, इसके बाद गुजरात में 600 मामले और 24 मौतें हुईं। स्‍वाइन फ्लू के मामलों में दिल्‍ली तीसरे स्‍थान पर हैं, यहां 532 लोगों के एच1 एन1 वायरस से संक्रमित होने की सूचना दी है। पंजाब में 27 मौतें और 174 मामले दर्ज किए गए, उसके बाद हरियाणा में आठ मौतें और 372 मामले दर्ज किए गए। महाराष्ट्र में 82 मामले और 12 मौतें दर्ज की गई हैं। संख्या बढ़ने के साथ, स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाल ही में राज्यों के साथ एक बैठक की और उन्हें बीमारी से निपटने के लिए गाइडलाइन जारी की है। बीमारी पर काबू पाने के लिए अस्‍पताल में बेड की संख्‍या और सुविधाएं बढ़ाने के लिए भी कहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि, स्वाइन फ्लू की दवा ओसेल्टामिविर का पर्याप्त स्टॉक है और साथ ही एन 95 मास्क और डायग्नोस्टिक किट की भी कोई कमी नहीं है। राज्यों से कहा गया है कि बीमारी में क्‍या करना चाहिए और क्‍या नहीं करना चाहिए इसके बारे में विस्‍तार से बताया जाए। वहीं दिल्‍ली सरकार ने भी इस संबंध में एडवाइजरी जारी की है।
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देश में पैदा होने वाला तीसरा बच्चा सिजेरियन से पैदा होता है

देश में पैदा होने वाला तीसरा बच्चा सिजेरियन से पैदा होता है

प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में पैदा होने वाला हर तीसरा बच्चा सिजेरियन है। सीएमएचओ रायपुर की संस्थागत प्रसव रिपोर्ट के अनुसार 11 माह में 5616 बच्चों ने जन्म लिया। इनमें से नार्मल डिलीवरी 3756 व सिजेरियन डिलीवरी 1860 हुई। जिला अस्पताल में हर सातवां बच्चा आॅपरेशन से पैदा हुआ। दूसरी ओर जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में सिजेरियन डिलीवरी से पैदा होने वाले बच्चों की संख्या काफी कम है। वहीं निजी अस्पतालों में आॅपरेशन से पैदा होने वाली बच्चों की संख्या सरकारी अस्पताल से काफी अधिक होने की संभावना है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार आॅपरेशन से पैदा होने वाले बच्चों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इनमें हर तीसरा बच्चा आॅपरेशन से पैदा होता है। डाक्टरों के अनुसार छोटे कद वाली महिलाओं के कूल्हे की हड्डी छोटी होने से बच्चा सामान्य तरीके से नहीं हो पाता। ऐसी अधिकांश महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी करनी पड़ती है। इनके अलावा लो लाइन प्लास्टेंटा, ट्यूमर, रक्त स्त्राव ज्यादा, बच्चे की धड़कन कम होना, सर्विक्स कैंसर,  गर्भवती का बीपी बढना, गले में गर्भनाल लिपटी होना, बच्चे का आड़ा या उलटा होना, महिला की उम्र ज्यादा होना, कई बार दवाओं से बच्चेदानी का मुंह नहीं खुल पाना ऐसे कारण हैं, जिनमें सर्जरी करनी पड़ती है। बच्चा जब पेट में ही मल-मूत्र कर दे तो उसे मिकोनियम कहते हैं, इस स्थिति में तत्काल आॅपरेशन कर बच्चे की जान बचाई जाती है। निजी अस्पतालों में गर्भवती प्रसव के दौरान होने वाली पीड़ा से बचने के लिए सिजेरियन डिलीवरी करवाती हैं। सामान्य प्रसव में महिला को 24 घंटे में अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है, लेकिन सिजेरियन में कम से कम 5 दिन तक अस्पताल में रहना होता है। साथ ही, सामान्य प्रसव में 5 से 15 हजार तक ही खर्च आता है, जबकि सिजेरियन में यह खर्च चौगुना हो जाता है। इसमें एनेस्थिसिया, पीडियाट्रिशियन और अस्पताल का खर्च शामिल करें तो करीब 25 से 50 हजार रुपए हो जाता है। 

इस मुद्दे पर चेंज डॉट ओआरजी पर एक आॅनलाइन अर्जी शुरू करने वाली शोधकर्ता सुवर्णा घोष ने आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा, ह्यसिजेरियन  के जरिए बच्चे पैदा करना एक धंधा बन गया है। अस्पताल और डॉक्टर महिलाओं से पैसे बना रहे हैं और उन्हें आपरेशन से डिलिवरी की तरफ धकेल रहे हैं।  देश भर के कई अस्पतालों पर मरीजों के साथ धोखाधड़ी , लापरवाही, जरूरत से ज्यादा बिल और रुपये ऐंठने के मामले सामने आते रहे हैं, ऐसे में एक दशक में सिजेरियन डिलीवरी में दोगुनी वृद्धि कई सवाल पैदा करती है।  सबसे ज्यादा हालात आंध्र प्रदेश में खराब हैं, जहां आॅपरेशन के जरिए 40.1 फीसदी बच्चे पैदा हुए। इसके बाद लक्षद्वीप में 37.1, केरल 35.8, तमिलनाडु 34.1, पुडुचेरी 33.6, जम्मू एवं कश्मीर 33.1 और गोवा में 31.4 फीसदी बच्चे आॅपरेशन के जरिए पैदा हुए हैं। वहीं दिल्ली में आॅपरेशन के जरिए पैदा होने वालों बच्चों का प्रतिशत 23.7 है। देश के सबसे बड़े आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में यह प्रतिशत 9.4 है। वहीं सबसे कम प्रतिशत नगालैंड में हैं जहां 5.8 फीसदी बच्चे आॅपरेशन के माध्यम से पैदा होते हैं। नेशनल सैंपल सर्वे (2014) के मुताबिक देशभर में 72 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 79 प्रतिशत आबादी निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं और सरकारी अस्पताल के मुकाबले उन्हें इलाज पर चार गुना ज्यादा खर्च करना पड़ता है। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस -4) के मुताबिक निजी अस्पतालों में 74.9% सिजेरियन आॅपरेशन हुए हैं। इसी सर्वे के मुताबिक तमिल नाडु में 34%, पुडुचेरी में 34%, केरल में 36%, आंध्र प्रदेश में 40%, महाराष्ट्र में 50%,और तेलंगाना में 58% डिलिवरी सिजेरियन से होती है। गर्भ में ही नवजात के बढ़े हो जाने से डिलीवरी में सिजेरियन के मामले हर साल बढ़ने लगे हैं। पिछले 5 सालों में संस्थागत प्रसव और आॅपरेशन से प्रसव की स्थिति को देखे तो सिजेरियन के केस बढ़ रहे हैं। 5 सालों में यहां कुल 82 हजार 628 बच्चों ने शासकीय व निजी अस्पतालों में जन्म लिया। इसमें से 4 हजार 509 बच्चे आॅपरेशन से हुए हैं। जो कि कुल प्रसव का मात्र साढ़े 5 प्रतिशत ही है। लेकिन यह प्रतिशत हर साल बढ़ रहे हैं। वर्ष 2012-13 में आॅपरेशन से हुए बच्चे मात्र 2.35 प्रतिशत थे, जो वर्ष 2013-14 में बढ़ कर 3.46 प्रतिशत, 2014-15 में 4.77 प्रतिशत, 2015-16 में 4.97 प्रतिशत और इस वर्ष 2016-17 में सबसे अधिक 5.66 प्रतिशत पर रहा। आंकड़ों का प्रतिशत भले की कम है लेकिन यदि प्रतिशत इसी तरह बढ़ते रहे हो आने वाले दिनों में गंभीर हो सकती है।   इस सर्वे के मुताबिक उत्तर के मुकाबले दक्षिण राज्यों में सिजेरियन डिलिवरी के केस ज्यादा हो रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इसके लिए खुद गर्भवती महिलाएं और उनके परिजनों का डर और रिस्क न उठाने की प्रवृत्ति जिम्मेदार है। डॉक्टर सिर्फ हर परिस्थिति से मरीज और उनके परिजनों को सतर्क करते हैं, निर्णय डॉक्टरों का नहीं होता। हालांकि इसका दूसरा पहलू यह है कि डॉक्टर्स की काउंसलिंग पर ही ये निर्भर करता है कि मरीज कौन सा विकल्प चुनते हैं। नैचुरल तरीके से बच्चे को जन्म देना और सिजेरियन द्वारा प्रसव कराना दोनों ही बिल्कुल विपरीत स्थितियां हैं। नॉर्मल तरीके से जन्म देने में असहनीय कष्ट होता है फिर भी इसे अच्छा माना जाता है। वहीं आॅपरेशन द्वारा जन्म भले ही बिना तकलीफ के हो रहा हो, लेकिन इसके कई नुकसान होते हैं। सिजेरियन डिलिवरी के बाद दूसरे बच्चे के जन्म की प्रक्रिया में कई तरह की जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। शोध इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि सी-सेक्‍शन के जरिये 39 हफ्तों से पैदा हुए बच्‍चों को साँस संबंधी तकलीफ होने की आशंका सामान्‍य रूप से जन्‍म लेने वाले बच्‍चों की तुलना में ज्यादा होती है। नॉर्मल डिलिवरी से बच्चे को एम्निओटिक फ्लूइड की सुरक्षा मिलती है , जिससे उसे पीलिया और हाइपोथर्मिया का खतरा कम होता है।वहीं सी सेक्शन से पैदा हुए बच्चे को बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है। सी-सेक्‍शन करवाने वाली महिलाओं को सामान्‍य डिलिवरी करवाने वाली महिलाओं के मुकाबले इंफेक्‍शन होने का खतरा ज्यादा होता है। उन्‍हें अधिक रक्‍त बहने, रक्‍त के थक्‍के जमने, पोस्‍टपार्टम दर्द, अधिक समय तक अस्‍पताल में रहना और डिलिवरी के बाद उबरने में अधिक समय लगना, जैसी परेशानियां हो सकती है। इसके अलावा ब्‍लैडर में चोट जैसी दुर्लभ दिक्‍कत भी हो सकती है।  कई बार प्रसव में जाने से पहले ही यह तय होता है कि महिला को सिजेरियन करवाने की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए कुछ विशेष परिस्थितियां और कारण जिम्मेदार होते हैं

,लखनऊ के सरकारी अस्पताल में नॉर्मल डिलिवरी 500 से 600 रूपए में हो जाती है , सिजेरियन में 2000 से 3000 तक का खर्च आता है । वो भी तब जब प्रसूता को प्राइवेट वार्ड में रखा जाए। इसमें दवा और खाना दोनों मुफ्त में उपलब्ध होता है। वहीँ प्राइवेट अस्पताल में सिजेरियन का खर्च करीब 30000 से 40000 तक आता है।इसमें दवाइयां और खाना शामिल नहीं होता। देश में 2.7 करोड़ बच्चे हर साल पैदा होते हैं. इन बच्चों में 17.2 फीसदी बच्चे सीजेरियन से पैदा होते हैं. इस तरह हर साल 46.44 लाख बच्चे सीजेरियन से पैदा होते हैं।इस तरह 23,220 करोड़ रुपये सिर्फ सीजेरियन डिलीवरी से निजी अस्पताल कमा रहे हैं. देश में आठ लाख चिकित्सकों के बावजूद हमारा देश स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र में 195 देशों की सूची में 154वें स्थान पर है, यह चिंता का विषय है और इस पर विचार किए जाने की जरूरत है।

   - प्रेमशंकर शर्मा (पुरोहित)


Saturday, 10 November 2018

पटाखों के प्रदूषण से बच्चों की जान का खतरा



पटाखों के प्रदूषण से बच्चों की जान का खतरा

प्रदूषण हर साल की कहानी है। लेकिन इसका कोई समाधान निकलता नहीं दिखता। नतीजा है कि वायु प्रदूषण लगातार अधिक घातक होता जा रहा है। इसकी तस्दीक विश्व स्वास्थ्य संगठन की वायु प्रदूषण और बच्चों के स्वास्थ्य पर जारी ताजा रिपोर्ट से भी हुई है। उसके अनुसार  दुनिया भर में 18 साल से कम उम्र के 93 फीसदी लोग प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। 2016 में वायु प्रदूषण से होने वाले सांस संबंधी बीमारियों की वजह से दुनिया भर में 5 साल से कम उम्र के 5.4 लाख बच्चों की मौत हुई है साल 2016 में घरेलू प्रदूषण के कारण पांच साल से कम उम्र के 66 890.5 बच्चों की मौत हो गई ।  वायु प्रदूषण बच्चों के स्वास्थ्य के लिये सबसे बड़ा खतरा बन गया है। नाइट्रोजन डॉयक्साइड  भी पीएम 2.5 और ओजोन के बनने में अपना योगदान देता है, ये दोनों वायु प्रदूषण के सबसे खतरनाक रूपों में बड़े क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। इस साल सबसे ज्यादा नाइट्रोजन डॉयक्साइड वाले क्षेत्रों में दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, भारत और चीन के नाम सबसे ऊपर हैं। ये क्षेत्र कोयला आधारित पावर प्लांट के लिए जाने जाते हैं। भारत में दिल्ली-एनसीआर, सोनभद्र- सिंगरौली, कोरबा तथा ओडीशा का तेलचर क्षेत्र ऐसे 50 शहरों की सूची में शामिल हैं। ये तथ्य साफ-साफ बता रहे हैं कि ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन जलने का वायु प्रदूषण से सीधा-सीधा संबंध है। बच्चे बाहर खेलें-कूदें, खिलखिलाएं और खुल कर सांस लें तो माना जाता है कि इससे उनका शारीरिक विकास होगा. लेकिन अब यही खुल कर सांस लेना बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है.हवा में बढ़ता प्रदूषण उनमें कई तरह की बीमारियां पैदा कर रहा है और उनके शारीरिक और मानसिक विकास में रुकावट डाल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की हालिया रिपोर्ट बच्चों पर प्रदूषण के गंभीर प्रभाव को दिखाती है. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में पांच साल से कम उम्र के एक लाख से ज्यादा (101 788.2) बच्चों की प्रदूषण के कारण मौत हो गई। इसके कारण भारत में 60,987, नाइजीरिया में 47,674, पाकिस्तान में 21,136 और कांगों में 12,890 बच्चों की जान चली गई। इन बच्चों में लड़कियों की संख्या ज्यादा है. कुल बच्चों में 32,889 लड़कियां और 28,097 लड़के शामिल हैं.प्रदूषण से सिर्फ़ पैदा हो चुके बच्चे ही नहीं बल्कि गर्भ में मौजूद बच्चों पर भी बुरा असर पड़ता है।
 प्रदूषण के कारण समय से पहले डिलीवरी, जन्म से ही शारीरिक या मानसिक दोष, कम वजन और मृत्यु तक हो सकती है.ऐसे तो प्रदूषण का सभी पर बुरा असर माना जाता है, लेकिन रिपोर्ट की मानें तो बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. प्रदूषण बच्चों के लिए कैसे जानलेवा साबित होता है, गर्भ में मौजूद बच्चे को यह कैसे बीमार कर सकता है.
नवजात बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. उनके फेफड़ों का विकास ठीक से नहीं हुआ होता है. ऐसे में प्रदूषण उसे जल्दी प्रभावित करता है. उसे खांसी, जुकाम जैसी एलर्जी हो सकती हैं. यहां तक कि अस्थमा और सांस लेने में दिक्कत बढ़ जाती है. यही बीमारियां बढ़कर मौत का कारण बन सकती हैं. इस दौरान बच्चे का मानसिक विकास भी हो रहा होता है और प्रदूषण के कण इसमें बाधा बनते हैं। 7 नवंबर 2016 को वायु प्रदूषण का यह हाल था कि दिल्ली के सभी प्राइमरी स्कूलों की तीन दिन के लिए बंद करना पड़ा। यही हाल पिछले वर्ष राजस्थान का भी रहा। दीपावली के आसपास जयपुर, जोधपुर, उदयपुर में पीएम 10 पीएम 2.5 सहित कार्बन मोनो आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड, कार्बन डाई आक्साइड आदि गैसों का स्तर सीमा से अधिक पाया गया था।  हम सभी यह जानते है कि पटाखों बम चलाने से वायु प्रदूषण होता है। पटाखों से निकले ने वाले प्रदूषक, हवा में चारों और फैल जाते है। जो केवल मानव जाति के स्वास्थ्य पर ही बुरा प्रभाव तो डालते हीं है साथ ही जीव-जन्तु पेड-पौधों को भी भारी नुकसान पहुंचाते है। पटाखों से निकले तत्व जैसे लिथियम, पोटेशियम, लेड, मर्करी, बेरेलियम आदि पूरे वायुमंडल मे फैल जाते है जो हमारे शरीर के धीमे जहर है।   एक फुलझड़ी से 74 सिगरेट के बराबर और एक अनार बम से 34 सिगरेट के बराबर धुआंं निकलता है इससे सोच सकते है कि दीपावली पर चलने वाले पटाखों से कितना विषैला धुआ वातावरण में फैलता होगा। इस वर्ष दीपावली पर स्माग (विषैला धुआं) की संभावना कम होगी जैसे सर्दी बढेगी, वायुमंडल में मौजूद विषैला धुआं संघनित होकर वापिस धरातल के आस पास जाएगा। जो स्मॉग का रुप ले लेगा। यह पटाखों से निकला विषैला धुआं आज नहीं तो कल मानव के लिए घातक होगा। पटाखे जलाने के कारण भारी मात्रा जहरीला धुआं उत्पन्न होता है। पटाखे जलाने से उत्पन्न यह धुआं कारखानों और गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से भी अधिक खतरनाक होता है। यह वायुमंडल को काफी बुरे तरीके से प्रभावित करता है और कई सारे वायु जनित बीमारियों का कारण बनता है। इस हानिकारक धुएं के कारण लोगो में श्वास संबंधित के साथ ही अन्य कई बीमारियां भी उत्पन्न होती है। इसके साथ ही पशु-पक्षी और अन्य कई जीव-जन्तु पटाखों द्वारा उत्पन्न होने वाले हानिकारक धुएं से बुरी तरीके से प्रभावित होते है। जैसे-जैसे प्रदूषण का स्तर बढ़ता है, मानव स्वास्थ्य पर भी इसका काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। हवा नकरात्मक प्रदूषको से भर जाती है, जिसके कारण लोगो में श्वास लेने में समस्या, फेफड़ो का जाम होना, आँखों में जलन महसूस होना, आँखों का लाल होना और त्वचा संबंधित बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं। वह लोग जो पहले से ही अस्थमा और ह्रदय रोग जैसी बीमारियों से पीड़ीत होते हैं, वह पटाखे जलाने से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण से सबसे बुरे तरीके से प्रभावित होते है।
इसके कारण उनका सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा ध्वनि प्रदूषण के कारण दिवाली का खुशनुमा त्योहार दुखदायी बन जाता है। पटाखों द्वारा उत्पन्न शोर-शराबे के कारण लोगो में बहरेपन की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है। दीवाली साल में केवल एक बार मनाई जाती है, लेकिन फिर ऐसा देखा गया है कि कई लोग इस त्योहार के जश्न में हफ्तों पहले से ही पटाखें जलाना शुरू कर देते हैं। दिवाली के दिन तो आतिशबाजी की संख्या बहुत ही बढ़ जाती है। नतीजतन, दिवाली के त्योहार के दौरान कई सारे बड़े शहरों के वायु की गुणवत्ता काफी खराब हो जाती है।  पटाखों में पोटेशियम, सल्फर, कार्बन, एंटीमोनी, बेरियम नाइट्रेट, एल्यूमीनियम, स्ट्रोंटियम, तांबे और लिथियम जैसे तत्व होते हैं। जब वे जलते हैं, तो यह उत्सर्जित रसायन हवा में धुएं या पिर लौह कड़ों के रुप में मिल जाते है। भले ही यह कण एक हफ्ते से अधिक समय तक वायुमंडल में नहीं रह सकते हैं, पर जब लोग इस हवा में सांस लेते हैं तो इसके उनपर कई दीर्घकालिक नकरात्मक प्रभाव पड़ते है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि दिवाली के एक दिन पटाखे जलाने से हमारे ग्रह के वातावरण पर कोई खास प्रभाव नही पड़ेगा, लेकिन यह सत्य नही है। आकड़ो से पता चलता है कि दिवाली के दिन पटाखे जलाने के कारण कई सारी गड़ियों के सड़क पर कई दिनों तक के चलने के बराबर का प्रदूषण उत्पन्न होता है। इसलिए यह ग्लोबल वार्मिंग की मात्रा में भी प्रतिवर्ष काफी वृद्धि करता है। पटाखे जलाने के कारण भारी मात्रा जहरीला धुआं उत्पन्न होता है। पटाखे जलाने से उत्पन्न यह धुआं कारखानों और गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से भी अधिक खतरनाक होता है। यह वायुमंडल को काफी बुरे तरीके से प्रभावित करता है और कई सारे वायु जनित बीमारियों का कारण बनता है। इस हानिकारक धुएं के कारण लोगो में श्वास संबंधित के साथ ही अन्य कई बीमारियां भी उत्पन्न होती है। इसके साथ ही पशु-पक्षी और अन्य कई जीव-जन्तु पटाखों द्वारा उत्पन्न होने वाले हानिकारक धुएं से बुरी तरीके से प्रभावित होते है। छोटे कदम - बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। पटाखों को फोड़ने से न सिर्फ हवा की गुणवत्ता में बिगड़ती है बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। तो भला हमें ऐसी गतिविधि में क्यों शामिल होना चाहिए,जिससे पर्यावरण के साथ-साथ हमारे जीवन पर भी इतने गंभीर दुष्प्रभाव पड़ते हो?पटाखों के बिना दीवाली मनाकर हम वातावरण को स्वस्थ्य करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। दिवाली एक सुंदर और मनमोहक त्यौहार है। कई सारे रिवाज और परंपराएं इस त्यौहार का एक हिस्सा हैं। इस दिन लोग पारंपरिक कपड़े पहननेऔरअपने घरों को सजाने और रोशन करने का काम करते हैं तथा अपने प्रियजनों के साथ ताश खेलने, घर पर मिठाई तथा रंगोली बनाने जैसे मनोरंजक कार्यों में हिस्सा लेते हैं।और इस सूची से आतिशबाजी को हटाने के बाद भीहमारे मनोरंजन पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। लेकिन हमारा यह फैसला पर्यावरण के लिए बहुत अच्छा साबित होगा। हमें स्वंय पटाखे फोड़ने बंद करने के साथ ही हमारे आस-पास के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करना होगा। इसके साथ ही हमें बच्चों को भी विशेष रूप से पर्यावरण पर पटाखों के हानिकारक प्रभावों के बारे में शिक्षित करना चाहिए। हमारे तरफ से किये गये यह छोटे-छोटे प्रयास बड़ा अंतर ला सकते हैं। दिवाली उत्सव का समय होता है। यह लोगो के चेहरों पर खुशी और मुस्कान लाने का समय होता है। पर्यावरण को प्रदूषित करके हमें इस मनमोहक पर्व का मजा खराब नही करना चाहिए। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे द्वारा किये जाने वाले यह छोटे-छोटे कार्य वैश्विक चिंता का कारण बन गये हैं। इनके द्वारा ग्लोबल वार्मिंग में भी काफी ज्यादा वृद्धि देखने को मिल रही है, जोकि आज के समय में पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा चिंता का कारण है। इसीलिए हमें स्वंय अपनी बुद्धिमता और विवेक का इस्तेमाल करते हुए पटाखों के उपयोग को बंद कर देना चाहिए।

गुम होती जा रही लोक शिल्प और कुम्हारों के चाक

गुम होती जा रही लोक शिल्प और कुम्हारों के चाक
आधुनिक युग में बाजारवादी संस्कृति के चलते लघु एवं कुटीर उद्योगों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हमारी लोक शिल्प कला एक-एक करके दम तोड़ती जा रहीं हैं।  जो बांस की खपच्चियों से अपनी कला को विविध आयाम देते हैं। प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं से मानव समाज अपनी आवश्यकताओं की जहां पूर्ति करता है। बांस, ताड़, और सरई से बनी हुई कुछ ऐसी वस्तुएं हैं, जो लोक शिल्प के सुंदर उदाहरण हैं। आधुनिक युग में प्लास्टिक के प्रचलन से इस पर भी काफी असर पड़ा है। प्लास्टिक उद्योग ने जहां कुम्हारों के पेट पर लात मारा है वहीं बांस से निर्मित शिल्प कला का सृजन करने वाले धरकार जाति की रोजी रोटी पर भी पड़ा है। धरकार जाति के लोग बंजारा जीवन के उदाहरण हैं, यानि इनका स्थायी निवास नहीं होता है, आज कहीं और तो कल कहीं और ठिकाना बना लेते हैं। हालांकि कुछ स्थायी रूप से झोपड़ियां बनाकर कर शहर या कसबों के पास में रहते है। जहां झोपड़ी में लोक शिल्प का सृजन कर अपनी जीविकोपार्जन कर रहे हैं। धरकार जाति बांस से बेना, दउरी, सूप, झाबा, डोलची, ढोकरी, चटाई के साथ-साथ पूजा-पाठ के लिए पवित्र आसनी तथा विवाह में प्रयुक्त होने वाला डाल और झपोली बनाते हैं। लेकिन अब बांस भी महंगाई की भेंट चढ़ गया है, जो बांस पहले 20 से 30 रुपये में मिल जाता था। वहीं अब 80 रुपये से कम में नहीं मिलता है। इसके साथ ही बांस की खेती भी नहीं हो रही है। जिसके कारण बड़ी मुश्किलों से बांस मिल पाता है।  इस महंगाई में पूरी मेहनत के बाद में भी एक आदमी बड़ी मुश्किल से 40 से 50 रुपये ही कमा पाता हूं।
गरीबी से जूझते दीपों के कारीगर कभी उत्सवों की शान समझे जाने वाले दीपों का व्यवसाय आज संकट के दौर से गुजर रहा है,और दीपावली में लोगों का घर रौशन करने वाले मिट्टी के कारीगर आज दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं। कुम्हार के चाक से बने खास दीपक दीपावली में चार चांद लगाते हैं लेकिन बदलती जीवन शैली और आधुनिक परिवेश में मिट्टी को आकार देने वाला कलाकार आज के व्यस्त जीवनशैली एवं आधुनिकता की चकाचौंध मे लुप्त होता जा रहा है। सैकड़ों - हजारों घरों को रोशनी से जगमग करने वाले कुम्हारों की जिंदगी मे आज भी अंधेरा ही अंघेरा है। बाजारों में दीयों की जगह आधुनिक तरह की तमाम रंग-बिरंगी बिजली की झालरों ने ले लिया हैे। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के सामने समस्या ही समस्या मुँह बाए खड़ी हैे। दीये, मिट्टी से बने खिलौने व दूसरे बर्तन बनाने के लिए गाँव के जिन तालाबों से ये कुम्हार मिट्टी निकालते थे उस पर अब लोगों को आपत्ति हैे। गोल-गोल घूमते पत्थर के चाक पर मिट्टी के दीये ,गुडियां व अन्य सामग्री बनाते इन कुम्हारों की अंगुलियों मे जो कला है वह दूसरे लोगों मे शायद ही होे! घूमते चाक पर मिट्टी के दीये व दूसरे बर्तन बनाने वाले इन कुम्हारों की याद दीपावली आने से पहले हर शख्स को आ जाती हैे। तालाबों से मिट्टी लाकर उन्हे सुखाना, सूखी मिट्टी को बारीक कर उसे छानना और उसके बाद गीली कर चाक पर रख तरह तरह के वस्तुओं को आकार बनाना इन कुम्हारों की जिंदगी का अहम काम हैे। इसी हुनर के चलते कुम्हारों के परिवार का भरण पोषण होता हैे। कुम्हार समाज की महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं। चाक चलाने का काम पुरुष करते हैं तो दूसरी ओर मिट्टी को भिगोने साफ करने और तैयार करने का काम महिलाएं करती हैं। इसके अलावा मिट्टी से बने खिलौने, व अन्य सामग्रियों को रंगने का काम भी महिलाओं के ही जिम्मे होता है। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक चायनीज दीये की मांग हर साल बढती ही जा रही है। दो वक्त की रोटी के लिए कड़ी धूप में मेहनत करने के बाद भी मिट्टी के व्यवसाय में महीनों लगा रहना पड़ता है उसके बावजूद न तो वाजिब दाम मिलते हैं और न ही खरीददार। समय की मार और आधुनिकता एवं परिवेश के चलते लोग अब मिट्टी के दीये उतने पसंद नहीं करते। दीपावली के त्योहार पर दीये शगुन के रुप में टिमटिमाते नजर आते थे जो अब लुप्त होने के कगार पर है। कच्चा माल भी महंगा हो गया है। दिन रात मेहनत के बाद हमें मजदूरी के रुप में अस्सी से 100 रुपये की कमाई हो पाती है। सारी बातों पर अगर गौर किया जाए तो मिट्टी से लाल खुद दाने दाने को मोहताज हैं। इनकी आर्थिक स्थिति दिनप्रतिदिन गिरने से इनको अपना पुस्तैनी कार्य व कारोबार छोड़ परिवार के भरण पोषण के लिए अन्य कार्यों के तरफ रुख करने को मजबूर होना पड़ रहा है।  एक समय था जब साल के बारहों महीने कुम्हारो का चाक चला करता था। उन्हें कुल्हड़, घड़ा, कलश, सुराही, दीये, ढकनी, आदि बनाने से फुर्सत नहीं मिलती थी। पूरा परिवार इसी से अच्छी कमाई कर लेता था, परंतु जब से थमार्कोल के पत्तल, दोने, प्लेट, चाय पीने के कप आदि का बाजार में प्रभुत्व बढ़ा कुम्हारों के चाक की रफ्तार धीमी पड़ गयी। मट्टी के बर्तन बनाने की कला मृतप्राय: हो चली थी आधुनिकता की चकाचौंध में यह कला अपने को मृत प्राय महसूस कर रही है। युवा वर्ग इनसे नाता तोड़ने को मजबूर हो गया है तो सरकारें भी इन्हें संजोये रखने के प्रति उदासीन हैं। अपनी तो जिंदगी चाक हुई, समय के थपेड़ों से।  एक समय वह भी था जब ये चाक निरंतर चलते रहते थे। कुम्हार एक-से-एक सुंदर एवं कलात्मक कृतियां गढ़ कर प्रफुल्लित और गौरवान्वित हो उठता था।आज ऐसा समय है, जब किसी को उसकी आवश्यकता नहीं है। मिट्टी के बर्तन को मूर्त रूप देना एक दुर्लभ कला है। परंतु इस विद्या में पारांगत कुम्हारों की कला विलुप्त होने के कगार पर खड़ी है।
पहले त्योहारों के अवसर पर उनके द्वारा बनाये गये मिट्टी के पात्रों का इस्तेमाल तो होता ही था,शादी विवाह और अन्य समारोहों में भी अपनी शुद्धता के चलते मिट्टी के पात्र चलन में थे। चाय की दुकानें तो इन्हीं के कुल्हडों से गुलजार होती थीं।आज के प्लास्टिक और थमार्कोल के गिलासों की तरह कुल्हडों से पर्यावरण को भी कोई खतरा नहीं था। आधुनिकता की चकाचौंध ने सब उलट-पुलट कर रख दिया। कुम्हार अपनी कला से मुंह मोड़ने को मजबूर हो चुका है।युवा वर्ग तो अब इस कला से जुड़ने की बजाय अन्य रोजगार अपनाना श्रेयस्कर समझता है। उसे चाक के साथ अपनी जिंदगी खाक करने का जरा भी शौक नहीं है।इसके सहारे अब तो दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल से हो पाता है। मिट्टी के बर्तन के बदले अब प्लास्टिक उद्योग की चांदी मिट्टी के पात्रों की जगह पूरी तरह से प्लास्टिक उद्योग ले चुका है, चाय की दुकान हो या दीपावली का त्योहार। एकबार फिर कुम्हारों में जीने की आस औरपैतृक धरोहर को संवारने में बल मिलेगा। उसी प्रकार कुम्हारों के पारंपरागत व्यवसाय को बचाने के लिए सुरक्षा प्रदान करें। उन्होंने कुम्हारी व्यवसाय को नयी संजीवनी देने की अपील की है। मिट्टी के लिये उन्हे जमीन के पट्टे भी दिये जायें। चुनाव में आश्वासन तो सभी देते है, लेकिन सुविधायें कभी नहीं मिलती।श्री बदरी ने बताया कि व्यवसाय को मुख्यमंत्री की संजीवनी मिलने से कुम्हार समाज को जीने का सहारा मिल जायेगा।

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