Saturday, 9 February 2019

देश में पैदा होने वाला तीसरा बच्चा सिजेरियन से पैदा होता है

देश में पैदा होने वाला तीसरा बच्चा सिजेरियन से पैदा होता है

प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में पैदा होने वाला हर तीसरा बच्चा सिजेरियन है। सीएमएचओ रायपुर की संस्थागत प्रसव रिपोर्ट के अनुसार 11 माह में 5616 बच्चों ने जन्म लिया। इनमें से नार्मल डिलीवरी 3756 व सिजेरियन डिलीवरी 1860 हुई। जिला अस्पताल में हर सातवां बच्चा आॅपरेशन से पैदा हुआ। दूसरी ओर जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में सिजेरियन डिलीवरी से पैदा होने वाले बच्चों की संख्या काफी कम है। वहीं निजी अस्पतालों में आॅपरेशन से पैदा होने वाली बच्चों की संख्या सरकारी अस्पताल से काफी अधिक होने की संभावना है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार आॅपरेशन से पैदा होने वाले बच्चों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इनमें हर तीसरा बच्चा आॅपरेशन से पैदा होता है। डाक्टरों के अनुसार छोटे कद वाली महिलाओं के कूल्हे की हड्डी छोटी होने से बच्चा सामान्य तरीके से नहीं हो पाता। ऐसी अधिकांश महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी करनी पड़ती है। इनके अलावा लो लाइन प्लास्टेंटा, ट्यूमर, रक्त स्त्राव ज्यादा, बच्चे की धड़कन कम होना, सर्विक्स कैंसर,  गर्भवती का बीपी बढना, गले में गर्भनाल लिपटी होना, बच्चे का आड़ा या उलटा होना, महिला की उम्र ज्यादा होना, कई बार दवाओं से बच्चेदानी का मुंह नहीं खुल पाना ऐसे कारण हैं, जिनमें सर्जरी करनी पड़ती है। बच्चा जब पेट में ही मल-मूत्र कर दे तो उसे मिकोनियम कहते हैं, इस स्थिति में तत्काल आॅपरेशन कर बच्चे की जान बचाई जाती है। निजी अस्पतालों में गर्भवती प्रसव के दौरान होने वाली पीड़ा से बचने के लिए सिजेरियन डिलीवरी करवाती हैं। सामान्य प्रसव में महिला को 24 घंटे में अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है, लेकिन सिजेरियन में कम से कम 5 दिन तक अस्पताल में रहना होता है। साथ ही, सामान्य प्रसव में 5 से 15 हजार तक ही खर्च आता है, जबकि सिजेरियन में यह खर्च चौगुना हो जाता है। इसमें एनेस्थिसिया, पीडियाट्रिशियन और अस्पताल का खर्च शामिल करें तो करीब 25 से 50 हजार रुपए हो जाता है। 

इस मुद्दे पर चेंज डॉट ओआरजी पर एक आॅनलाइन अर्जी शुरू करने वाली शोधकर्ता सुवर्णा घोष ने आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा, ह्यसिजेरियन  के जरिए बच्चे पैदा करना एक धंधा बन गया है। अस्पताल और डॉक्टर महिलाओं से पैसे बना रहे हैं और उन्हें आपरेशन से डिलिवरी की तरफ धकेल रहे हैं।  देश भर के कई अस्पतालों पर मरीजों के साथ धोखाधड़ी , लापरवाही, जरूरत से ज्यादा बिल और रुपये ऐंठने के मामले सामने आते रहे हैं, ऐसे में एक दशक में सिजेरियन डिलीवरी में दोगुनी वृद्धि कई सवाल पैदा करती है।  सबसे ज्यादा हालात आंध्र प्रदेश में खराब हैं, जहां आॅपरेशन के जरिए 40.1 फीसदी बच्चे पैदा हुए। इसके बाद लक्षद्वीप में 37.1, केरल 35.8, तमिलनाडु 34.1, पुडुचेरी 33.6, जम्मू एवं कश्मीर 33.1 और गोवा में 31.4 फीसदी बच्चे आॅपरेशन के जरिए पैदा हुए हैं। वहीं दिल्ली में आॅपरेशन के जरिए पैदा होने वालों बच्चों का प्रतिशत 23.7 है। देश के सबसे बड़े आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में यह प्रतिशत 9.4 है। वहीं सबसे कम प्रतिशत नगालैंड में हैं जहां 5.8 फीसदी बच्चे आॅपरेशन के माध्यम से पैदा होते हैं। नेशनल सैंपल सर्वे (2014) के मुताबिक देशभर में 72 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 79 प्रतिशत आबादी निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं और सरकारी अस्पताल के मुकाबले उन्हें इलाज पर चार गुना ज्यादा खर्च करना पड़ता है। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस -4) के मुताबिक निजी अस्पतालों में 74.9% सिजेरियन आॅपरेशन हुए हैं। इसी सर्वे के मुताबिक तमिल नाडु में 34%, पुडुचेरी में 34%, केरल में 36%, आंध्र प्रदेश में 40%, महाराष्ट्र में 50%,और तेलंगाना में 58% डिलिवरी सिजेरियन से होती है। गर्भ में ही नवजात के बढ़े हो जाने से डिलीवरी में सिजेरियन के मामले हर साल बढ़ने लगे हैं। पिछले 5 सालों में संस्थागत प्रसव और आॅपरेशन से प्रसव की स्थिति को देखे तो सिजेरियन के केस बढ़ रहे हैं। 5 सालों में यहां कुल 82 हजार 628 बच्चों ने शासकीय व निजी अस्पतालों में जन्म लिया। इसमें से 4 हजार 509 बच्चे आॅपरेशन से हुए हैं। जो कि कुल प्रसव का मात्र साढ़े 5 प्रतिशत ही है। लेकिन यह प्रतिशत हर साल बढ़ रहे हैं। वर्ष 2012-13 में आॅपरेशन से हुए बच्चे मात्र 2.35 प्रतिशत थे, जो वर्ष 2013-14 में बढ़ कर 3.46 प्रतिशत, 2014-15 में 4.77 प्रतिशत, 2015-16 में 4.97 प्रतिशत और इस वर्ष 2016-17 में सबसे अधिक 5.66 प्रतिशत पर रहा। आंकड़ों का प्रतिशत भले की कम है लेकिन यदि प्रतिशत इसी तरह बढ़ते रहे हो आने वाले दिनों में गंभीर हो सकती है।   इस सर्वे के मुताबिक उत्तर के मुकाबले दक्षिण राज्यों में सिजेरियन डिलिवरी के केस ज्यादा हो रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इसके लिए खुद गर्भवती महिलाएं और उनके परिजनों का डर और रिस्क न उठाने की प्रवृत्ति जिम्मेदार है। डॉक्टर सिर्फ हर परिस्थिति से मरीज और उनके परिजनों को सतर्क करते हैं, निर्णय डॉक्टरों का नहीं होता। हालांकि इसका दूसरा पहलू यह है कि डॉक्टर्स की काउंसलिंग पर ही ये निर्भर करता है कि मरीज कौन सा विकल्प चुनते हैं। नैचुरल तरीके से बच्चे को जन्म देना और सिजेरियन द्वारा प्रसव कराना दोनों ही बिल्कुल विपरीत स्थितियां हैं। नॉर्मल तरीके से जन्म देने में असहनीय कष्ट होता है फिर भी इसे अच्छा माना जाता है। वहीं आॅपरेशन द्वारा जन्म भले ही बिना तकलीफ के हो रहा हो, लेकिन इसके कई नुकसान होते हैं। सिजेरियन डिलिवरी के बाद दूसरे बच्चे के जन्म की प्रक्रिया में कई तरह की जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। शोध इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि सी-सेक्‍शन के जरिये 39 हफ्तों से पैदा हुए बच्‍चों को साँस संबंधी तकलीफ होने की आशंका सामान्‍य रूप से जन्‍म लेने वाले बच्‍चों की तुलना में ज्यादा होती है। नॉर्मल डिलिवरी से बच्चे को एम्निओटिक फ्लूइड की सुरक्षा मिलती है , जिससे उसे पीलिया और हाइपोथर्मिया का खतरा कम होता है।वहीं सी सेक्शन से पैदा हुए बच्चे को बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है। सी-सेक्‍शन करवाने वाली महिलाओं को सामान्‍य डिलिवरी करवाने वाली महिलाओं के मुकाबले इंफेक्‍शन होने का खतरा ज्यादा होता है। उन्‍हें अधिक रक्‍त बहने, रक्‍त के थक्‍के जमने, पोस्‍टपार्टम दर्द, अधिक समय तक अस्‍पताल में रहना और डिलिवरी के बाद उबरने में अधिक समय लगना, जैसी परेशानियां हो सकती है। इसके अलावा ब्‍लैडर में चोट जैसी दुर्लभ दिक्‍कत भी हो सकती है।  कई बार प्रसव में जाने से पहले ही यह तय होता है कि महिला को सिजेरियन करवाने की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए कुछ विशेष परिस्थितियां और कारण जिम्मेदार होते हैं

,लखनऊ के सरकारी अस्पताल में नॉर्मल डिलिवरी 500 से 600 रूपए में हो जाती है , सिजेरियन में 2000 से 3000 तक का खर्च आता है । वो भी तब जब प्रसूता को प्राइवेट वार्ड में रखा जाए। इसमें दवा और खाना दोनों मुफ्त में उपलब्ध होता है। वहीँ प्राइवेट अस्पताल में सिजेरियन का खर्च करीब 30000 से 40000 तक आता है।इसमें दवाइयां और खाना शामिल नहीं होता। देश में 2.7 करोड़ बच्चे हर साल पैदा होते हैं. इन बच्चों में 17.2 फीसदी बच्चे सीजेरियन से पैदा होते हैं. इस तरह हर साल 46.44 लाख बच्चे सीजेरियन से पैदा होते हैं।इस तरह 23,220 करोड़ रुपये सिर्फ सीजेरियन डिलीवरी से निजी अस्पताल कमा रहे हैं. देश में आठ लाख चिकित्सकों के बावजूद हमारा देश स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र में 195 देशों की सूची में 154वें स्थान पर है, यह चिंता का विषय है और इस पर विचार किए जाने की जरूरत है।

   - प्रेमशंकर शर्मा (पुरोहित)


Saturday, 10 November 2018

पटाखों के प्रदूषण से बच्चों की जान का खतरा



पटाखों के प्रदूषण से बच्चों की जान का खतरा

प्रदूषण हर साल की कहानी है। लेकिन इसका कोई समाधान निकलता नहीं दिखता। नतीजा है कि वायु प्रदूषण लगातार अधिक घातक होता जा रहा है। इसकी तस्दीक विश्व स्वास्थ्य संगठन की वायु प्रदूषण और बच्चों के स्वास्थ्य पर जारी ताजा रिपोर्ट से भी हुई है। उसके अनुसार  दुनिया भर में 18 साल से कम उम्र के 93 फीसदी लोग प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। 2016 में वायु प्रदूषण से होने वाले सांस संबंधी बीमारियों की वजह से दुनिया भर में 5 साल से कम उम्र के 5.4 लाख बच्चों की मौत हुई है साल 2016 में घरेलू प्रदूषण के कारण पांच साल से कम उम्र के 66 890.5 बच्चों की मौत हो गई ।  वायु प्रदूषण बच्चों के स्वास्थ्य के लिये सबसे बड़ा खतरा बन गया है। नाइट्रोजन डॉयक्साइड  भी पीएम 2.5 और ओजोन के बनने में अपना योगदान देता है, ये दोनों वायु प्रदूषण के सबसे खतरनाक रूपों में बड़े क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। इस साल सबसे ज्यादा नाइट्रोजन डॉयक्साइड वाले क्षेत्रों में दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, भारत और चीन के नाम सबसे ऊपर हैं। ये क्षेत्र कोयला आधारित पावर प्लांट के लिए जाने जाते हैं। भारत में दिल्ली-एनसीआर, सोनभद्र- सिंगरौली, कोरबा तथा ओडीशा का तेलचर क्षेत्र ऐसे 50 शहरों की सूची में शामिल हैं। ये तथ्य साफ-साफ बता रहे हैं कि ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन जलने का वायु प्रदूषण से सीधा-सीधा संबंध है। बच्चे बाहर खेलें-कूदें, खिलखिलाएं और खुल कर सांस लें तो माना जाता है कि इससे उनका शारीरिक विकास होगा. लेकिन अब यही खुल कर सांस लेना बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है.हवा में बढ़ता प्रदूषण उनमें कई तरह की बीमारियां पैदा कर रहा है और उनके शारीरिक और मानसिक विकास में रुकावट डाल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की हालिया रिपोर्ट बच्चों पर प्रदूषण के गंभीर प्रभाव को दिखाती है. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में पांच साल से कम उम्र के एक लाख से ज्यादा (101 788.2) बच्चों की प्रदूषण के कारण मौत हो गई। इसके कारण भारत में 60,987, नाइजीरिया में 47,674, पाकिस्तान में 21,136 और कांगों में 12,890 बच्चों की जान चली गई। इन बच्चों में लड़कियों की संख्या ज्यादा है. कुल बच्चों में 32,889 लड़कियां और 28,097 लड़के शामिल हैं.प्रदूषण से सिर्फ़ पैदा हो चुके बच्चे ही नहीं बल्कि गर्भ में मौजूद बच्चों पर भी बुरा असर पड़ता है।
 प्रदूषण के कारण समय से पहले डिलीवरी, जन्म से ही शारीरिक या मानसिक दोष, कम वजन और मृत्यु तक हो सकती है.ऐसे तो प्रदूषण का सभी पर बुरा असर माना जाता है, लेकिन रिपोर्ट की मानें तो बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. प्रदूषण बच्चों के लिए कैसे जानलेवा साबित होता है, गर्भ में मौजूद बच्चे को यह कैसे बीमार कर सकता है.
नवजात बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. उनके फेफड़ों का विकास ठीक से नहीं हुआ होता है. ऐसे में प्रदूषण उसे जल्दी प्रभावित करता है. उसे खांसी, जुकाम जैसी एलर्जी हो सकती हैं. यहां तक कि अस्थमा और सांस लेने में दिक्कत बढ़ जाती है. यही बीमारियां बढ़कर मौत का कारण बन सकती हैं. इस दौरान बच्चे का मानसिक विकास भी हो रहा होता है और प्रदूषण के कण इसमें बाधा बनते हैं। 7 नवंबर 2016 को वायु प्रदूषण का यह हाल था कि दिल्ली के सभी प्राइमरी स्कूलों की तीन दिन के लिए बंद करना पड़ा। यही हाल पिछले वर्ष राजस्थान का भी रहा। दीपावली के आसपास जयपुर, जोधपुर, उदयपुर में पीएम 10 पीएम 2.5 सहित कार्बन मोनो आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड, कार्बन डाई आक्साइड आदि गैसों का स्तर सीमा से अधिक पाया गया था।  हम सभी यह जानते है कि पटाखों बम चलाने से वायु प्रदूषण होता है। पटाखों से निकले ने वाले प्रदूषक, हवा में चारों और फैल जाते है। जो केवल मानव जाति के स्वास्थ्य पर ही बुरा प्रभाव तो डालते हीं है साथ ही जीव-जन्तु पेड-पौधों को भी भारी नुकसान पहुंचाते है। पटाखों से निकले तत्व जैसे लिथियम, पोटेशियम, लेड, मर्करी, बेरेलियम आदि पूरे वायुमंडल मे फैल जाते है जो हमारे शरीर के धीमे जहर है।   एक फुलझड़ी से 74 सिगरेट के बराबर और एक अनार बम से 34 सिगरेट के बराबर धुआंं निकलता है इससे सोच सकते है कि दीपावली पर चलने वाले पटाखों से कितना विषैला धुआ वातावरण में फैलता होगा। इस वर्ष दीपावली पर स्माग (विषैला धुआं) की संभावना कम होगी जैसे सर्दी बढेगी, वायुमंडल में मौजूद विषैला धुआं संघनित होकर वापिस धरातल के आस पास जाएगा। जो स्मॉग का रुप ले लेगा। यह पटाखों से निकला विषैला धुआं आज नहीं तो कल मानव के लिए घातक होगा। पटाखे जलाने के कारण भारी मात्रा जहरीला धुआं उत्पन्न होता है। पटाखे जलाने से उत्पन्न यह धुआं कारखानों और गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से भी अधिक खतरनाक होता है। यह वायुमंडल को काफी बुरे तरीके से प्रभावित करता है और कई सारे वायु जनित बीमारियों का कारण बनता है। इस हानिकारक धुएं के कारण लोगो में श्वास संबंधित के साथ ही अन्य कई बीमारियां भी उत्पन्न होती है। इसके साथ ही पशु-पक्षी और अन्य कई जीव-जन्तु पटाखों द्वारा उत्पन्न होने वाले हानिकारक धुएं से बुरी तरीके से प्रभावित होते है। जैसे-जैसे प्रदूषण का स्तर बढ़ता है, मानव स्वास्थ्य पर भी इसका काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। हवा नकरात्मक प्रदूषको से भर जाती है, जिसके कारण लोगो में श्वास लेने में समस्या, फेफड़ो का जाम होना, आँखों में जलन महसूस होना, आँखों का लाल होना और त्वचा संबंधित बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं। वह लोग जो पहले से ही अस्थमा और ह्रदय रोग जैसी बीमारियों से पीड़ीत होते हैं, वह पटाखे जलाने से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण से सबसे बुरे तरीके से प्रभावित होते है।
इसके कारण उनका सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा ध्वनि प्रदूषण के कारण दिवाली का खुशनुमा त्योहार दुखदायी बन जाता है। पटाखों द्वारा उत्पन्न शोर-शराबे के कारण लोगो में बहरेपन की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है। दीवाली साल में केवल एक बार मनाई जाती है, लेकिन फिर ऐसा देखा गया है कि कई लोग इस त्योहार के जश्न में हफ्तों पहले से ही पटाखें जलाना शुरू कर देते हैं। दिवाली के दिन तो आतिशबाजी की संख्या बहुत ही बढ़ जाती है। नतीजतन, दिवाली के त्योहार के दौरान कई सारे बड़े शहरों के वायु की गुणवत्ता काफी खराब हो जाती है।  पटाखों में पोटेशियम, सल्फर, कार्बन, एंटीमोनी, बेरियम नाइट्रेट, एल्यूमीनियम, स्ट्रोंटियम, तांबे और लिथियम जैसे तत्व होते हैं। जब वे जलते हैं, तो यह उत्सर्जित रसायन हवा में धुएं या पिर लौह कड़ों के रुप में मिल जाते है। भले ही यह कण एक हफ्ते से अधिक समय तक वायुमंडल में नहीं रह सकते हैं, पर जब लोग इस हवा में सांस लेते हैं तो इसके उनपर कई दीर्घकालिक नकरात्मक प्रभाव पड़ते है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि दिवाली के एक दिन पटाखे जलाने से हमारे ग्रह के वातावरण पर कोई खास प्रभाव नही पड़ेगा, लेकिन यह सत्य नही है। आकड़ो से पता चलता है कि दिवाली के दिन पटाखे जलाने के कारण कई सारी गड़ियों के सड़क पर कई दिनों तक के चलने के बराबर का प्रदूषण उत्पन्न होता है। इसलिए यह ग्लोबल वार्मिंग की मात्रा में भी प्रतिवर्ष काफी वृद्धि करता है। पटाखे जलाने के कारण भारी मात्रा जहरीला धुआं उत्पन्न होता है। पटाखे जलाने से उत्पन्न यह धुआं कारखानों और गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से भी अधिक खतरनाक होता है। यह वायुमंडल को काफी बुरे तरीके से प्रभावित करता है और कई सारे वायु जनित बीमारियों का कारण बनता है। इस हानिकारक धुएं के कारण लोगो में श्वास संबंधित के साथ ही अन्य कई बीमारियां भी उत्पन्न होती है। इसके साथ ही पशु-पक्षी और अन्य कई जीव-जन्तु पटाखों द्वारा उत्पन्न होने वाले हानिकारक धुएं से बुरी तरीके से प्रभावित होते है। छोटे कदम - बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। पटाखों को फोड़ने से न सिर्फ हवा की गुणवत्ता में बिगड़ती है बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। तो भला हमें ऐसी गतिविधि में क्यों शामिल होना चाहिए,जिससे पर्यावरण के साथ-साथ हमारे जीवन पर भी इतने गंभीर दुष्प्रभाव पड़ते हो?पटाखों के बिना दीवाली मनाकर हम वातावरण को स्वस्थ्य करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। दिवाली एक सुंदर और मनमोहक त्यौहार है। कई सारे रिवाज और परंपराएं इस त्यौहार का एक हिस्सा हैं। इस दिन लोग पारंपरिक कपड़े पहननेऔरअपने घरों को सजाने और रोशन करने का काम करते हैं तथा अपने प्रियजनों के साथ ताश खेलने, घर पर मिठाई तथा रंगोली बनाने जैसे मनोरंजक कार्यों में हिस्सा लेते हैं।और इस सूची से आतिशबाजी को हटाने के बाद भीहमारे मनोरंजन पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। लेकिन हमारा यह फैसला पर्यावरण के लिए बहुत अच्छा साबित होगा। हमें स्वंय पटाखे फोड़ने बंद करने के साथ ही हमारे आस-पास के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करना होगा। इसके साथ ही हमें बच्चों को भी विशेष रूप से पर्यावरण पर पटाखों के हानिकारक प्रभावों के बारे में शिक्षित करना चाहिए। हमारे तरफ से किये गये यह छोटे-छोटे प्रयास बड़ा अंतर ला सकते हैं। दिवाली उत्सव का समय होता है। यह लोगो के चेहरों पर खुशी और मुस्कान लाने का समय होता है। पर्यावरण को प्रदूषित करके हमें इस मनमोहक पर्व का मजा खराब नही करना चाहिए। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे द्वारा किये जाने वाले यह छोटे-छोटे कार्य वैश्विक चिंता का कारण बन गये हैं। इनके द्वारा ग्लोबल वार्मिंग में भी काफी ज्यादा वृद्धि देखने को मिल रही है, जोकि आज के समय में पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा चिंता का कारण है। इसीलिए हमें स्वंय अपनी बुद्धिमता और विवेक का इस्तेमाल करते हुए पटाखों के उपयोग को बंद कर देना चाहिए।

गुम होती जा रही लोक शिल्प और कुम्हारों के चाक

गुम होती जा रही लोक शिल्प और कुम्हारों के चाक
आधुनिक युग में बाजारवादी संस्कृति के चलते लघु एवं कुटीर उद्योगों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हमारी लोक शिल्प कला एक-एक करके दम तोड़ती जा रहीं हैं।  जो बांस की खपच्चियों से अपनी कला को विविध आयाम देते हैं। प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं से मानव समाज अपनी आवश्यकताओं की जहां पूर्ति करता है। बांस, ताड़, और सरई से बनी हुई कुछ ऐसी वस्तुएं हैं, जो लोक शिल्प के सुंदर उदाहरण हैं। आधुनिक युग में प्लास्टिक के प्रचलन से इस पर भी काफी असर पड़ा है। प्लास्टिक उद्योग ने जहां कुम्हारों के पेट पर लात मारा है वहीं बांस से निर्मित शिल्प कला का सृजन करने वाले धरकार जाति की रोजी रोटी पर भी पड़ा है। धरकार जाति के लोग बंजारा जीवन के उदाहरण हैं, यानि इनका स्थायी निवास नहीं होता है, आज कहीं और तो कल कहीं और ठिकाना बना लेते हैं। हालांकि कुछ स्थायी रूप से झोपड़ियां बनाकर कर शहर या कसबों के पास में रहते है। जहां झोपड़ी में लोक शिल्प का सृजन कर अपनी जीविकोपार्जन कर रहे हैं। धरकार जाति बांस से बेना, दउरी, सूप, झाबा, डोलची, ढोकरी, चटाई के साथ-साथ पूजा-पाठ के लिए पवित्र आसनी तथा विवाह में प्रयुक्त होने वाला डाल और झपोली बनाते हैं। लेकिन अब बांस भी महंगाई की भेंट चढ़ गया है, जो बांस पहले 20 से 30 रुपये में मिल जाता था। वहीं अब 80 रुपये से कम में नहीं मिलता है। इसके साथ ही बांस की खेती भी नहीं हो रही है। जिसके कारण बड़ी मुश्किलों से बांस मिल पाता है।  इस महंगाई में पूरी मेहनत के बाद में भी एक आदमी बड़ी मुश्किल से 40 से 50 रुपये ही कमा पाता हूं।
गरीबी से जूझते दीपों के कारीगर कभी उत्सवों की शान समझे जाने वाले दीपों का व्यवसाय आज संकट के दौर से गुजर रहा है,और दीपावली में लोगों का घर रौशन करने वाले मिट्टी के कारीगर आज दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं। कुम्हार के चाक से बने खास दीपक दीपावली में चार चांद लगाते हैं लेकिन बदलती जीवन शैली और आधुनिक परिवेश में मिट्टी को आकार देने वाला कलाकार आज के व्यस्त जीवनशैली एवं आधुनिकता की चकाचौंध मे लुप्त होता जा रहा है। सैकड़ों - हजारों घरों को रोशनी से जगमग करने वाले कुम्हारों की जिंदगी मे आज भी अंधेरा ही अंघेरा है। बाजारों में दीयों की जगह आधुनिक तरह की तमाम रंग-बिरंगी बिजली की झालरों ने ले लिया हैे। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के सामने समस्या ही समस्या मुँह बाए खड़ी हैे। दीये, मिट्टी से बने खिलौने व दूसरे बर्तन बनाने के लिए गाँव के जिन तालाबों से ये कुम्हार मिट्टी निकालते थे उस पर अब लोगों को आपत्ति हैे। गोल-गोल घूमते पत्थर के चाक पर मिट्टी के दीये ,गुडियां व अन्य सामग्री बनाते इन कुम्हारों की अंगुलियों मे जो कला है वह दूसरे लोगों मे शायद ही होे! घूमते चाक पर मिट्टी के दीये व दूसरे बर्तन बनाने वाले इन कुम्हारों की याद दीपावली आने से पहले हर शख्स को आ जाती हैे। तालाबों से मिट्टी लाकर उन्हे सुखाना, सूखी मिट्टी को बारीक कर उसे छानना और उसके बाद गीली कर चाक पर रख तरह तरह के वस्तुओं को आकार बनाना इन कुम्हारों की जिंदगी का अहम काम हैे। इसी हुनर के चलते कुम्हारों के परिवार का भरण पोषण होता हैे। कुम्हार समाज की महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं। चाक चलाने का काम पुरुष करते हैं तो दूसरी ओर मिट्टी को भिगोने साफ करने और तैयार करने का काम महिलाएं करती हैं। इसके अलावा मिट्टी से बने खिलौने, व अन्य सामग्रियों को रंगने का काम भी महिलाओं के ही जिम्मे होता है। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक चायनीज दीये की मांग हर साल बढती ही जा रही है। दो वक्त की रोटी के लिए कड़ी धूप में मेहनत करने के बाद भी मिट्टी के व्यवसाय में महीनों लगा रहना पड़ता है उसके बावजूद न तो वाजिब दाम मिलते हैं और न ही खरीददार। समय की मार और आधुनिकता एवं परिवेश के चलते लोग अब मिट्टी के दीये उतने पसंद नहीं करते। दीपावली के त्योहार पर दीये शगुन के रुप में टिमटिमाते नजर आते थे जो अब लुप्त होने के कगार पर है। कच्चा माल भी महंगा हो गया है। दिन रात मेहनत के बाद हमें मजदूरी के रुप में अस्सी से 100 रुपये की कमाई हो पाती है। सारी बातों पर अगर गौर किया जाए तो मिट्टी से लाल खुद दाने दाने को मोहताज हैं। इनकी आर्थिक स्थिति दिनप्रतिदिन गिरने से इनको अपना पुस्तैनी कार्य व कारोबार छोड़ परिवार के भरण पोषण के लिए अन्य कार्यों के तरफ रुख करने को मजबूर होना पड़ रहा है।  एक समय था जब साल के बारहों महीने कुम्हारो का चाक चला करता था। उन्हें कुल्हड़, घड़ा, कलश, सुराही, दीये, ढकनी, आदि बनाने से फुर्सत नहीं मिलती थी। पूरा परिवार इसी से अच्छी कमाई कर लेता था, परंतु जब से थमार्कोल के पत्तल, दोने, प्लेट, चाय पीने के कप आदि का बाजार में प्रभुत्व बढ़ा कुम्हारों के चाक की रफ्तार धीमी पड़ गयी। मट्टी के बर्तन बनाने की कला मृतप्राय: हो चली थी आधुनिकता की चकाचौंध में यह कला अपने को मृत प्राय महसूस कर रही है। युवा वर्ग इनसे नाता तोड़ने को मजबूर हो गया है तो सरकारें भी इन्हें संजोये रखने के प्रति उदासीन हैं। अपनी तो जिंदगी चाक हुई, समय के थपेड़ों से।  एक समय वह भी था जब ये चाक निरंतर चलते रहते थे। कुम्हार एक-से-एक सुंदर एवं कलात्मक कृतियां गढ़ कर प्रफुल्लित और गौरवान्वित हो उठता था।आज ऐसा समय है, जब किसी को उसकी आवश्यकता नहीं है। मिट्टी के बर्तन को मूर्त रूप देना एक दुर्लभ कला है। परंतु इस विद्या में पारांगत कुम्हारों की कला विलुप्त होने के कगार पर खड़ी है।
पहले त्योहारों के अवसर पर उनके द्वारा बनाये गये मिट्टी के पात्रों का इस्तेमाल तो होता ही था,शादी विवाह और अन्य समारोहों में भी अपनी शुद्धता के चलते मिट्टी के पात्र चलन में थे। चाय की दुकानें तो इन्हीं के कुल्हडों से गुलजार होती थीं।आज के प्लास्टिक और थमार्कोल के गिलासों की तरह कुल्हडों से पर्यावरण को भी कोई खतरा नहीं था। आधुनिकता की चकाचौंध ने सब उलट-पुलट कर रख दिया। कुम्हार अपनी कला से मुंह मोड़ने को मजबूर हो चुका है।युवा वर्ग तो अब इस कला से जुड़ने की बजाय अन्य रोजगार अपनाना श्रेयस्कर समझता है। उसे चाक के साथ अपनी जिंदगी खाक करने का जरा भी शौक नहीं है।इसके सहारे अब तो दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल से हो पाता है। मिट्टी के बर्तन के बदले अब प्लास्टिक उद्योग की चांदी मिट्टी के पात्रों की जगह पूरी तरह से प्लास्टिक उद्योग ले चुका है, चाय की दुकान हो या दीपावली का त्योहार। एकबार फिर कुम्हारों में जीने की आस औरपैतृक धरोहर को संवारने में बल मिलेगा। उसी प्रकार कुम्हारों के पारंपरागत व्यवसाय को बचाने के लिए सुरक्षा प्रदान करें। उन्होंने कुम्हारी व्यवसाय को नयी संजीवनी देने की अपील की है। मिट्टी के लिये उन्हे जमीन के पट्टे भी दिये जायें। चुनाव में आश्वासन तो सभी देते है, लेकिन सुविधायें कभी नहीं मिलती।श्री बदरी ने बताया कि व्यवसाय को मुख्यमंत्री की संजीवनी मिलने से कुम्हार समाज को जीने का सहारा मिल जायेगा।

Saturday, 6 October 2018

राफेल कहें या रा.. फेल

राफेल  कहें या रा.. फेल

कई राज्यों में चुनाव दस्तक देने वाले हैं। चुनावी सुग-बुगाहट चरम पर पहुँचने को है। हमारे देश के तथाकथित नौजवान नेता चुनावी मनोदशा में आ चुके हैं। एक नए बुल-बुले का फूटना तो मानो तय था, तो हो गयी घोषणा- राफेल डील में घोटाला। बुद्धिजीवियों को, मुझ जैसे पत्रकरों और छात्रों को, सबको एक नया व रोचक प्रसंग मिल गया।राफेल डील में लगाए गए धांधली के आरोपों का विश्लेषण करते वक्त; मेरा कुछ सवालों से सामना हुआ। आखिर ये नया विदेशी शब्द ‘राफेल’जिसका नाम हर समाचार विश्लेषक जप रहा है, किस बला का नाम है? राफेल डील वाकई में एक घोटाला है या मात्र बेबुनियादी विवाद? क्या सही में यह राष्ट्रीय-हित से जुड़ा सवाल है या चुनावी वर्ष में वोट बटोरने की कोशिश? बात अप्रैल 2015 से आरंभ होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय वायुसेना की‘क्रिटिकल आॅपरेशनल नेसेसिटी’ का हवाला देते हुए फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमानों की ‘फ्लाईवे कंडीशन’ में खरीद समझौते का ऐलान किया। अब राफेल पर आते हैं, राफेल एक फ्रेंच ट्विन-इंजन मल्टीरोल लड़ाकू विमान है। एयर सुप्रीमेसी, इंटरडिक्शन, एयर रिकांनासेंस, एन्टी-शिप स्ट्राइक व परमाणु हथियारों की क्षमता से लैस एक बेहतरीन लड़ाकू विमान । फिर प्रश्न आता है, राफेल ही क्यों? अमेरिका मेड एफ-16 या यूरोफाइटर टाईफून क्यों नहीं? विशेषज्ञों की मानें तो फ्रांस ही एक-मात्र ऐसा विमान उत्पादक देश है, जिसका हमारे परमाणु कार्यक्रम की ओर नरम रुख है। जंग में अगर कभी चीन या पाकिस्तान के खिलाफ राफेल से परमाणु बम दागने की जरूरत पड़ी तो फ्रांस को इससे कोई आपत्ति नहीं होगी। अब इस मुद्दे पर राजनीति की गुंजाइश नहीं बची। किन्तु क्योंकि फिलहाल, राफेल, राहुल की नई गेंद है। सो उन्हें खेलने देना चाहिए! इस गेंद को भाजपा और खासकर प्रधानमंत्री की ओर निशानाकर उछालते हुए राहुल कुछ बातें भूल गए।
राफेल विमान सौदे के खिलाफ कांग्रेस अब आते हैं विवादित पहलुओं पर-पहला, कांग्रेस का दावा है की यू.पी.ए. सरकार के समय यही समझौता 520.10 करोड़ रुपए प्रति विमान के हिसाब से तय होने की कगार पर था। वहीं दूसरी ओर, वर्तमान एन.डी.ए. नीत सरकार प्रति विमान 1670.70 करोड़ रुपए का भुगतान कर रही है, जो की सीधे-सीधे तीन गुना ज्यादा कीमत है 36 हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा दिया था वह चार ट्वीट में फूलते-फूलते (राहुल गांधी के ही शब्दों में ) एक सौ तीस हजार करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।
कांग्रेस के जिम्मेदार नेता भले इन आंकड़ों पर जानकारी देने में बगलें झांकने लगें लेकिन राहुल गांधी तो ऐसे फितूरी आंकड़ों का पहाड़ा चढ़ ही सकते हैं! दही के धोखे में कपास खा जाने जैसी हड़बड़ाहट और कच्चेपन का उदाहरण देती दूसरी बात सौदे में रिलायंस के दाखिल होने से जुड़ी है। कांग्रेस समर्थक इसे उनकी ‘अदा’ मान सकते हैं किन्तु पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति के बयान को अपनी बात पर मुहर मानकर लपकते हुए राहुल दो बातें यहां भी भूल गए।
हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की बजाय रिलायंस के लिए इस सौदे में गुंजाइश प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते और सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए ही बन गई थी। दरअसल, अप्रैल 2013 के पहले सप्ताह की बात है जब भारतीय मीडिया में यह खबर पहली बार आई कि हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का पुराना ‘खस्ता प्रदर्शन’ भारतीय वायुसेना के लिए नए लड़ाकू राफेल विमानों की खरीद के आड़े आ रहा है। यही कारण था कि एचएएल के नाम पर दसौं एविएशन हिचकिचा रही थी। अंतत: दसौं एविएशन ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए, दिसंबर 2013 में ही, रिलायंस से हाथ मिला लिया था। दरअसल, राजनीति में उथलेपन के प्रतीक बने और वक्त बेवक्त बेकाबू होने वाले राजनेता से पूछने लायक सवाल यह है कि देश की सुरक्षा जरूरतों को लगातार टालने और आंतरिक खतरों को बढ़ाते जाने पर कांग्रेस और इसके कर्णधार कुनबे को कठघरे में क्यों नहीं खड़ा किया जाना चाहिए। अब देखना है कांग्रेस के हाथ में गेंद को कितने समय तक खेंलेगे, या बहरहाल, राफेल मुद्दे की पतंग वाड्रा जैसे पेड़ की लंदन तक फैली पत्तियों (या संपत्तियों) और संजय भंडारी जैसी टहनियों पर जाकर टंगेगी यह तो राहुल ने सोचा भी नहीं होगा। वैसे, उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं है! कांग्रेस के भीतर जो सोच नहीं सकते वे राहुल-राफेल के पोस्टर चिपका रहे हैं। जो सोच सकते हैं वे रा..फेल बुदबुदा रहे हैं।



Wednesday, 12 September 2018

भारत बना समलैंगिकता का 125 वां देश

 भारत बना समलैंगिकता का 125 वां देश
उच्चतम न्यायालय द्वारा समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के साथ ही भारत उन 125 (रिपीट) (125) अन्य देशों के साथ जुड़ गया, जहां समलैंगिकता वैध है। लेकिन दुनियाभर में अब भी 72 ऐसे देश और क्षेत्र हैं जहां समलैंगिक संबंध को अपराध समझा जाता है। उनमें 45 वे देश भी हैं जहां महिलाओं का आपस में यौन संबंध बनाना गैर कानूनी है। उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने भादंसं की धारा 377 के तहत 158 साल पुराने इस औपनिवेशिक कानून के संबंधित हिस्से को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया और कहा कि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। इंटरनेशनल लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांस एंड इंटरसेक्स एसोसिएशन के अनुसार आठ ऐसे देश हैं जहां समलैंगिक संबंध पर मृत्युदंड का प्रावधान है और दर्जनों ऐसे देश हैं जहां इस तरह के संबंधों पर कैद की सजा हो सकती है। जिन कुछ देशों समलैंगिक संबंध वैध ठहराये गये हैं उनमें अर्जेंटीना, ग्रीनलैंड, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, आईसलैंड, स्पेन, बेल्जियम, आयरलैंड, अमेरिका, ब्राजील, लक्जमबर्ग, स्वीडन और कनाडा शामिल हैं। समलैंगिकता अब अपराध नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध बताने वाली धारा ३७७ को निरस्त कर दिया है। गौरतलब है इस मसले पर कोर्ट ने जुलाई में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और इसपर अपना निर्णय सुनाया। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय खंडपीठ ने समलैंगिकता को अपराध बतानेवाली धारा को खत्म करने का फैसला सुनाया है। इस फैसले के बाद अब समलैंगिकता अपराध नहीं रहेगी।  देश भर इस मसले पर चर्चा रही है।  जहाँ कुछ लोग इसे अनैतिक बताते रहे हैं वहीं कुछ इसे लोगों की मर्जी पर छोड़ देने के हक में रहे थे।  अब कोर्ट का फैसला आने के बाद साफ हो गया है। उच्चतम न्यायालय ने एकमत से अपनी व्यवस्था में कहा कि परस्पर सहमति से वयस्कों के बीच समलैंगिक यौन संबंध अपराध नहीं हैं। ऐसे यौन संबंधों को अपराध के दायरे में रखने संबंधी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के प्रावधान से संविधान में प्रदत्त समता और गरिमा के अधिकार का हनन होता है। शीर्ष अदालत ने धारा 377 के तहत सहमति से समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर करते हुये कहा कि यह तर्कहीन, सरासर मनमाना और बचाव नहीं किये जाने वाला है।  पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से 495 पेज में चार अलग अलग फैसलों में कहा कि एलजीबीटीक्यू समुदाय को देश के दूसरे नागरिकों के समान ही सांविधानिक अधिकार प्राप्त हैं। संविधान पीठ ने लैंगिक रूझान को ‘‘जैविक घटना और ‘‘स्वाभाविक’’ इस आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव से मौलिक अधिकारों का हनन होता है। न्यायालय ने कहा, नैतिकता को सामाजिक नैतिकता की वेदी पर शहीद नहीं किया जा सकता और कानून के शासन के अंतर्गत सिर्फ सांविधानिक नैतिकता की अनुमति दी जा सकती है।‘‘पीठ ने कहा कि एलजीबीटीक्यू समाज के सदस्यों को परेशान करने के लिये धारा 377 का एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है जिसकी परिणति भेदभाव में होती है। न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा,  जहां तक यह दो वयस्कों, चाहें समलैंगिक (आदमी और आदमी), विषमलैंगिक (आदमी और महिला) या लेस्बियन (स्त्री और स्त्री) के बीच सहमति से अप्राकृतिक यौन रिश्तों को दंडित करती है, सांविधानिक नहीं मानी जा सकती। हालांकि, यदि कोई, हमारा तात्पर्य स्त्री और पुरूष दोनों, किसी जानवर के साथ किसी भी तरह की यौन क्रिया में संलिप्त होते हैं तो धारा 377 का यह पहलू सांविधानिक है और यह इस कानून में यथावत दंडनीय अपराध बना रहेगा। धारा 377 में वर्णित कोई भी क्रिया यदि दो वयस्कों में से किसी एक की सहमति के बगैर की जाती है तो यह धारा 377 के तहत दंडनीय होगा। शीर्ष अदालत ने हालांकि अपनी व्यवस्था में कहा कि धारा 377 में प्रदत्त, पशुओं और बच्चों से संबंधित अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करने को अपराध की श्रेणी में रखने वाले प्रावधान यथावत रहेंगे। धारा 377 अप्राकृतिक अपराधों से संबंधित है  जो कोई भी स्वेच्छा से प्राकृतिक व्यवस्था के विपरीत किसी पुरूष, महिला या पशु के साथ गुदा मैथुन करता है तो उसे उम्र कैद या फिर एक निश्चित अवधि के लिये कैद जो दस साल तक बढ़ाई जा सकती है, की सजा होगी और उसे जुमार्ना भी देना होगा। न्यायालय ने कहा कि अदालतों को प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि गरिमा के साथ जीने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में माना गया है।


Friday, 7 September 2018

विडंबना: भारत में शिक्षा का बाजारीकरण

विडंबना: भारत में शिक्षा का बाजारीकरण
शिक्षक समाज में उच्च आदर्श स्थापित करने वाला व्यक्तित्व होता है। किसी भी देश या समाज के निर्माण में शिक्षा की अहम भूमिका होती है, कहा जाए तो शिक्षक समाज का आइना होता है। हिन्दू धर्म में शिक्षक के लिए कहा गया है कि आचार्य देवो भव: यानी कि शिक्षक या आचार्य ईश्वर के समान होता है। यह दर्जा एक शिक्षक को उसके द्वारा समाज में दिए गए योगदानों के बदले स्वरुप दिया जाता है। शिक्षक का दर्जा समाज में हमेशा से ही पूज्यनीय रहा है। कोई उसे गुरु कहता है, कोई शिक्षक कहता है, कोई आचार्य कहता है, तो कोई अध्यापक या टीचर कहता है ये सभी शब्द एक ऐसे व्यक्ति को चित्रित करते हैं, जो सभी को ज्ञान देता है, सिखाता है और जिसका योगदान किसी भी देश या राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करना है। गुरु या शिक्षक का संबंध केवल विद्यार्थी को शिक्षा देने से ही नहीं होता बल्कि वह अपने विद्यार्थी को हर मोड़ पर उसको राह दिखाता है और उसका हाथ थामने के लिए हमेशा तैयार रहता है एक शिक्षक या गुरु द्वारा अपने विद्यार्थी को स्कूल में जो सिखाया जाता है या जैसा वह सीखता है, वे वैसा ही व्यवहार करते हैं। उनकी मानसिकता भी कुछ वैसी ही बन जाती है जैसा वह अपने आसपास होता देखते हैं। इसलिए एक शिक्षक या गुरु ही अपने विद्यार्थी को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
सफल जीवन के लिए शिक्षा बहुत उपयोगी है जो हमें गुरु द्वारा प्रदान की जाती है। विश्व में केवल भारत ही ऐसा देश है यहां पर शिक्षक अपने शिक्षार्थी को ज्ञान देने के साथ-साथ गुणवत्तायुक्त शिक्षा भी देते हैं,किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है। अगर राष्ट्र की शिक्षा नीति अच्छी है तो उस देश को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता अगर राष्ट्र की शिक्षा नीति अच्छी नहीं होगी तो वहां की प्रतिभा दब कर रह जायेगी बेशक किसी भी राष्ट्र की शिक्षा नीति बेकार हो, लेकिन एक शिक्षक बेकार शिक्षा नीति को भी अच्छी शिक्षा नीति में तब्दील कर देता है।शिक्षकों द्वारा प्रारंभ से ही पाठ्यक्रम के साथ ही साथ जीवन मूल्यों की शिक्षा भी दी जाती है। शिक्षा हमें ज्ञान, विनम्रता, व्यवहारकुशलता और योग्यता प्रदान करती है। शिक्षक को ईश्वर तुल्य माना जाता है। आज भी बहुत से शिक्षक शिक्षकीय आर्दशो पर चलकर एक आदर्श मानव समाज की स्थापना में अपनी महती भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ ऐसे भी शिक्षक हैं जो शिक्षक और शिक्षा के नाम को कलंकित कर रहे हैं। और ऐसे शिक्षकों ने शिक्षा को व्यवसाय बना दिया है, जिससे एक निर्धन शिक्षार्थी को शिक्षा से वंचित रहना पड़ता है। धन के अभाव से अपनी पढ़ाई छोड़नी पडती है। प्राचीन समय में छात्र गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। वहां गुरु छात्र को संस्कारित बनाता था लेकिन आधुनिक जीवन में लोगों के पास शायद विकल्प कम रह गए हैं और ये कोचिंग संस्थान इसी का फायदा उठाते हैं। शिक्षा को व्यवसाय बनाकर  उसका बाजारीकरण किया जा रहा है। निजी कोचिंग सैंटर हर गली, मोहल्ले और सोसायटी में सभी को झूठे प्रलोभन देकर अपने जाल में फंसा रहे हैं और खुल्लम-खुल्ला शिक्षा  के नाम पर सौदेबाजी कर रहे हैं। मजबूर और असहाय अभिभावक विकल्प खोजते-खोजते उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में फंस जाते हैं जिसका निजी संस्थान भरपूर लाभ उठा रहे हैं। कई तो ऐसे पूंजीपति लोग देखने में आते हैं जिनका शिक्षा से कोसों तक कोई नाता नहीं होता लेकिन उन्होंने अपने धन और ऐश्वर्य के बल पर इन विद्या मंदिरों को सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने का साधन बना डाला है। आज यह शिक्षा का व्यापारीकरण नहीं तो और क्या है?भारत का शिक्षातंत्र दुनिया का सबसे बड़ा तंत्र है। भारत में प्रथम मॉडर्न विश्वविद्यालय 1857 में स्थापित हुआ और चीन में 1895 में। आज चीन की शिक्षा स्थिति क्या है और भारत की क्या। भारत में इस वक्त आठ सौ विश्वविद्यालय एवं 43 हजार कॉलेज हैं। बावजदू इसके दुनिया के प्रथम दो सौ विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी नहीं। हम यूजी और पीजी में छात्रों को जो डिग्रियां बांट रहे हैं उनमें से केवल नौ फीसदी ही रोजगार पाने लायक हैं। आज भारत में 18-24 वर्ष के 14 करोड़ युवा उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन इनमें प्रवेशित मात्र 24 फीसदी ही होते हैं। भारतीय मूल्यों को प्रतिस्थापित करने के लिए आज उच्च शिक्षा में शोध की गुणवत्ता में सुधार की जरुरत है। सत्र 2017-18 में देश में 35 हजार पीएचडी हुईं। लेकिन अधिकांश में गुणवत्ता गायब है।शिक्षा का जिस तरह व्यवसायीकरण हो रहा है और इसके लिए मोटी फीस वसूली जा रही है, उसमें शिक्षा के मूल्यों की अपेक्षा करना मुश्किल है। स्किल्ड नहीं होने से 70 फीसदी स्टूडेंट आज रोजगार से वंचित हैं। छात्र-छात्राओं के साथ शिक्षकों में भी मूल्यपरकता होना जरुरी है। क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी डॉ.राजीव गुप्ता ने कहा कि भारत में हर वर्ष एक करोड़ छात्र स्नातक की डिग्री लेकर निकल रहे हैं।
 ज्ञान का संग्रहण और उसका कुशलतम उपयोग ही शिक्षा है। अब पाठ्यक्रम में केवल सैद्धांतिक पक्ष से ही काम नहीं चलेगा बल्कि व्यवहारिक पक्ष को भी उसका हिस्सा बनना होगा।-शिक्षा के बाजारीकरण का अर्थ है शिक्षा को बाजार में बेचने-खरीदने की वस्तु में बदल देना अर्थात शिक्षा आज समाज में मात्र एक वस्तु बन कर रह गई है और स्कूलों को मुनाफे की दृष्टि से चलाने वाले दुकानदार बन चुके हैं तथा इस प्रकार की दुकानें ही छात्रों के भविष्य को बर्बाद कर रही हैं। अभिभावक भी शिक्षा की इन दुकानों की चकाचौंध को देख कर उनमें फंसते जा रहे हैं परन्तु अंत में जब तक अभिभावकों को इन दुकानों की वास्तविकता का पता चलता है तब तक वे अपना धन और समय गंवा चुके होते हैं।  स्कूलों में बच्चों की गुणवत्ता की अपेक्षा बच्चों की संख्या पर विशेष ध्यान दिया जाता है जोकि सर्वथा अनुचित है। नए शैक्षिक सत्र के आरंभ में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर स्कूल प्रशासक अभिभावकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं लेकिन कुछ समय के पश्चात जब वास्तविकता सामने आती है तो वे मजबूरन कुछ नहीं कर सकते और अपने बच्चों के लिए स्कूल प्रशासन की उचित-अनुचित मांगों को पूरा करने के लिए बाध्य हो जाते हैं।आज शिक्षा की आड़ में पैसा कमाना ही मूल उद्देश्य बन कर रह गया है। महंगाई और बाजारीकरण के मौजूदा दौर में छात्र इस असमंजस में फंसा हुआ है कि वह कमाने के लिए पढ़े या पढने के लिए कमाए। बाजारीकरण की दीमक पूरी शिक्षा व्यवस्था को खोखला करती जा रही है। आज आवश्यकता है कि इस विषय में सरकार कुछ ठोस कदम उठाए तथा शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश की प्रक्रिया में अधिक से अधिक पारर्दशता लाने का प्रयास करे क्योंकि किसी भी राष्ट्र का विकास तभी संभव हो सकता है जब वहां की अधिकतम जनसंख्या शिक्षित और अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो।  यह वही भारत है जो अपनी संस्कृति के कारण विश्व भर में विख्यात है और जहां दूसरे देशों से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते हैं लेकिन भारतीय संस्कृति की पहचान हमारी शिक्षा का नैतिक मूल्य स्तर दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है।आजकल शहरों में तो क्या, गांवों में भी शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। यदि आंकड़ों को देखा जाए तो सरकारी स्कूलों में केवल निर्धन वर्ग के लोगों के बच्चे ही पढने के लिए आते है, क्योंकि निजी शिक्षा संस्थाओं के फीस के रूप में बड़ी-बड़ी रकमें वसूली जाती है, जिन्हें केवल पैसे वाले ही अदा कर पाते है। आज अच्छी और उच्च शिक्षा का व्यवसायीकरण हो रहा है। निजी शिक्षण संस्थानों के संचालक मनमर्जी की फीस वसूल कर रहे है या यूँ कहें शिक्षा का बाजार लगाकर लूट मचा रखी है। जहाँ एक तरफ जितनी स्कूल की फीस बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ उतना ही शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है की इस सबके लिये कही ना कही हम सब भी जिम्मेदार हैं।
शिक्षा के ऐसे हालातों को देखते हुए सरकार को कुछ सख्त कदम उठाना चाहिये और शिक्षा का मौलिक आधार प्रत्येक बच्चे तक पहुँचाना चाहिये। हमारी सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि वो आम जनता को क्यों इस प्रकार लुटने दे रही है। इन व्यवसायिक निजी स्कूलों के स्तर की ही शिक्षा मिशनरी स्कूल (मसलन सेंट पॉल, कॉन्वेन्ट, सेंट जेवियर, सेंट रैफल, सेंट नारबर्ट आदि) भी दे रहे हैं और अपेक्षाकृत काफी कम फीस में, तो कुछ स्कूलों को ऐसा अधिकार क्यों कि वो बच्चों के भोले-भाले अभिभावकों को शिक्षा के नाम पर बेवकूफ बना कर उनसे मनमाना फीसवसूल करें। इस मनमानी को रोकने के लिए सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा का व्यवसायीकरण पर रोक लगाये। निजी शिक्षण संस्थाओं की फीस सरकार द्वारा तय की जानी चाहिए तथा इस फीस इतनी हो कि निर्धन वर्ग के बच्चे भी उन शिक्षण संस्थाना में शिक्षा ग्रहण कर सके, क्योंकि भारत देश की अधिकतर आबादी ग्रामीण आंचल में बसती है, जो निर्धन वर्ग में आती है।

Saturday, 1 September 2018


केरल में आई सदी की सबसे विनाशकारी बाढ़ से अब तक 370 लोगों की मौत हो चुकी है और कई लाख लोग बेघर हो चुके हैं। हालांकि, बारिश धीमी होने और जलस्तर घटने से अब राज्य में संक्रामक बीमारियों के प्रकोप का खतरा मंडराने लगा है। हार्ट केयर फाउंडेशन (एचसीएफआई) के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल ने कहा कि बाढ़ की शुरूआत के बाद संक्रामक बीमारियों और उनके संचरण का प्रकोप दिन, हफ्ते या महीने के भीतर हो सकता है। बाढ़ के दौरान और बाद में सबसे आम स्वास्थ्य जोखिमों में से एक है, जल स्रोतों का प्रदूषण। ठहरा हुआ पानी मच्छरों के लिए प्रजनन स्थल बन जाता है, इस प्रकार वेक्टर-जनित बीमारियों की संभावना में वृद्धि होती है। बीमारियों में जैसे लेप्टोस्पायरोसिस एक तरह का बैक्टीरियल इन्फेक्शन है, जो आदमियों और जानवरों दोनों को प्रभावित करता है। आमतौर पर ये रोग पालतू जानवरों जैसे गाय, भैंस, बकरी, मुर्गों, कुत्तों और चूहों से फैलता है। आमतौर पर इस रोग के लक्षण जल्दी दिखाई नहीं देते हैं मगर बाढ़ और पानी आदि के प्रभाव में ये रोग तेजी से एक से दूसरे व्यक्ति या जानवर में फैलते हैं। आमतौर पर दूषित पानी और जानवरों के मल मूत्र के संपर्क में आने से फैलने वाला लेप्टोस्पायरोसिस रोग जानलेवा नहीं होता है मगर ये किडनी को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। 
बैक्टीरिया की वजह से होने वाली बीमारी हैजा बाढ़ के दौरान फैलने वाली सबसे घातक बीमारी होती है। इसके कारण उल्टी, दस्त और निर्जलीकरण यानी डिहाइड्रेशन हो जाता है। कई गंभीर मामलों में हैजा जानलेवा भी हो सकता है। दरअसल हैजा एक खास तरह के बैक्टीरिया के कारण फैलता है। यह मुंह और मलमार्ग के माध्यम से जोर पकड़ता है। इससे प्रभावित लोगों के मल में बड़ी संख्या में इस बीमारी के जीवाणु पाए जाते हैं। इस मल के बाढ़ के पानी में मिल जाने की स्थिति में इसके कारण बड़े पैमाने पर संक्रमण फैल जाता है और बहुत तेजी से लोग हैजा के शिकार होने लगते हैं। बाढ़ के समय में शरण स्थल के शिविरों में पहले ही साफ-सफाई की कमी होती है, जिससे तीव्र संक्रमणशील यह बीमारी जल्दी ही महामारी का रूप ले लेती है। बाढ़ के दौरान अन्य बीमारियां- बाढ़ के दौरान कई तरह के जलजनित रोगों जैसे मियादी बुखार, हैजा और हेपेटाइटिस ए, लेप्टोस्पायरोसिस आदि का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा मच्छरों से पैदा होने वाली बीमारियां जैसे मलेरिया, डेंगू बुखार, पीतज्वर और वेस्ट नाइल फीवर आदि का भी खतरा बहुत ज्यादा होता है। बाढ़ के दौरान बरतें ये सावधानियां- बाढ़ के पानी के साथ सीधे संपर्क में न आने की पूरी कोशिश करें तथा कभी भी इसका सेवन न करें। आमतौर पर नलके का पानी बाढ़ से अप्रभावित होता है और पीने के लिए सुरक्षित होता है। अगर आपको पानी में जाना ही पड़े, तो रबड़ के जूते और या वाटर प्रूफ दस्ताने पहनें। नियमित रूप से अपने हाथों को धोएं, विशेष रूप से खाने से पहले। अगर पानी उपलब्ध नहीं है, तो हैंड  सेनिटाइजर या वेट वाइप का प्रयोग करें। अगर कहीं कट या छिल गया हो, तो वहां वाटरप्रूफ  प्लास्टर पहनें। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि केंद्र ने बाढ़ प्रभावित केरल में किसी तरह की महामारी को रोकने के लिए 3,757 मेडिकल शिविर लगाए हैं. बाढ़ का पानी घटने के साथ माहौल संक्रामक बीमारियों के अनुकूल हो जाएगा। राज्य को दैनिक निगरानी के लिए कहा गया है जिससे किसी भी प्रकोप के शुरूआती संकेतों का पता लगाया जा सके.संक्रामक बीमारियों, उनकी रोकथाम व नियंत्रण, सुरक्षित पेयजल, सफाई के कदम, वेक्टर नियंत्रण व अन्य चीजों पर राज्य के साथ स्वास्थ्य परामर्श साझा किया गया है। राज्य के स्वास्थ्य निदेशालय को आशंका है कि राज्य में पानी और हवा से होने वाली बीमारियां तेजी से फैल सकती हैं। रुका पानी और मौजूदा मौसम बैक्टीरियों के तेजी से पनपने के लिए काफी अनुकूल है लेकिन इस नए खतरे से निपटना आसान नहीं होगा क्योंकि राज्य में इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाएं चौपट हो गई हैं। कोच्चि के पास अलुवा में चिकनपॉक्स के लक्षण सामने आने के बाद तीन लोगों को अलग शिविर में रखा गया है।
 केरल में मॉनसून से पहले फरवरी में भी चिकनपॉक्स के काफी मामले देखे गए थे। जीका वाइरस के कारण भी हाल में केरल में कई लोगों की मौत का दावा किया गया था। चिकनपॉक्स के अलावा अधिकारियों को डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया और जानवरों के यूरिन और मल के सीधे संपर्क में आने से फैलने वाले संक्रामक रोगों के फैलने की भी आशंका है। बाढ़ से प्रभावित लोगों में डायरिया, हेपेटाइटिस, वायरल बुखार और सांस संबंधी संक्रमण फैलने का भी खतरा है। अगर इनमें से कोई भी बीमारी फैलती है तो उसे रोकना काफी चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि दो लाख से ज्यादा परिवार इस समय राहत शिविरों में रह रहे हैं। बीमारियों के फैलने खतरे को देखते हुए राज्य सरकार ने शिविरों से घरों को लौट रहे लोगों के लिए एडवाइजरी जारी की है, जिसमें बताया गया है कि पानी और खाने को लेकर क्या सावधानी बरतनी है। पानी गर्म न हो सके तो लोगों को क्लोरीनयुक्त पानी पीने को कहा गया है। इसके साथ ही लोगों को मरे हुए पक्षियों या जानवरों के अवशेषों को जमीन में गहरा गड्ढा खोदकर दफनाने को कहा गया है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि बोरवेल्स से पानी का सीधे इस्तेमाल न करें।

, पिछले सात सालों में 18 लाख उद्यम बंद हुए  एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले सात वर्षों ( 2015-16  से  2022-23 ) में भारत में लगभग 18 लाख उद्यम (M...